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उत्तर प्रदेश में दलित मतदाताओं का बढ़ता राजनीतिक प्रभाव, Jatav और non-Jatav वोट पर सभी दलों की नजर

23 सितंबर 2026:  उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित मतदाता लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। राज्य में अनुसूचित जाति समुदाय की आबादी करीब 21 प्रतिशत मानी जाती है और यह मतदाता वर्ग अलग-अलग उप-समुदायों में बंटा हुआ है। इनमें Jatav के साथ Pasi, Valmiki, Khatik, Kori और अन्य non-Jatav दलित समुदाय शामिल हैं। आगामी 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों की ओर से इन समुदायों तक पहुंच बढ़ाने की कोशिशें तेज हुई हैं।

लंबे समय तक BSP के साथ जुड़ा रहा दलित वोट

उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति की चर्चा लंबे समय तक बहुजन समाज पार्टी (BSP) और उसकी प्रमुख नेता मायावती के इर्द-गिर्द रही है। खासतौर पर Jatav समुदाय को BSP का महत्वपूर्ण समर्थन आधार माना जाता रहा है।

चुनावी आंकड़ों के अनुसार 2007 के विधानसभा चुनाव में करीब 86 प्रतिशत Jatav मतदाताओं ने BSP का समर्थन किया था, जबकि non-Jatav दलितों में यह आंकड़ा करीब 54 प्रतिशत था। 2022 के विधानसभा चुनाव तक BSP का समर्थन Jatav मतदाताओं में करीब 65 प्रतिशत और non-Jatav दलितों में करीब 27 प्रतिशत रह गया। ये आंकड़े अलग-अलग चुनावों में मतदान व्यवहार में बदलाव को दिखाते हैं।

Jatav और non-Jatav मतदाताओं में अंतर

उत्तर प्रदेश के दलित मतदाताओं को एक समान राजनीतिक समूह के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। विभिन्न चुनावी सर्वेक्षणों में Jatav और non-Jatav दलितों के मतदान रुझानों में अंतर सामने आया है।

Lokniti-CSDS से जुड़े आंकड़ों के अनुसार 2022 के विधानसभा चुनाव में करीब 65 प्रतिशत Jatav मतदाताओं ने BSP का समर्थन किया था। वहीं non-Jatav दलितों में BSP का समर्थन करीब 27 प्रतिशत रहा और BJP को करीब 41 प्रतिशत समर्थन मिला था।

इससे यह स्पष्ट होता है कि दलित समुदाय के भीतर अलग-अलग सामाजिक समूहों का राजनीतिक व्यवहार एक जैसा नहीं रहा है। चुनावी परिस्थितियों, स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवारों और गठबंधनों के आधार पर इन समूहों के रुझान बदल सकते हैं।

BJP की non-Jatav दलितों तक पहुंच

पिछले कुछ चुनावों में BJP ने non-Jatav दलित समुदायों के बीच अपना संगठनात्मक और राजनीतिक संपर्क बढ़ाने पर जोर दिया है। Pasi, Khatik, Dhobi और Valmiki जैसे समुदायों तक पहुंच बनाने की कोशिशें इसका हिस्सा रही हैं।

सितंबर 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार BJP उत्तर प्रदेश में इन समुदायों के साथ संपर्क और संवाद बढ़ाने की तैयारी कर रही है। रिपोर्ट में राज्य के करीब 21 प्रतिशत दलित मतदाताओं के बीच समर्थन मजबूत करने की कोशिशों का उल्लेख किया गया है।

समाजवादी पार्टी भी बढ़ा रही है संपर्क

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने भी non-Yadav OBC समुदायों के साथ-साथ non-Jatav दलितों के बीच अपना आधार बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया है। सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक पार्टी बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने और नए सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने की रणनीति पर काम कर रही है।

इससे यह संकेत मिलता है कि दलित मतदाताओं को लेकर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा केवल एक पार्टी तक सीमित नहीं है। अलग-अलग दल अपने सामाजिक गठजोड़ को व्यापक बनाने के लिए इन समुदायों के बीच संपर्क बढ़ा रहे हैं।

BSP के सामने बदलते राजनीतिक समीकरण

BSP के लिए बदलते दलित मतदान रुझान विशेष महत्व रखते हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का कुल वोट शेयर करीब 12.8 प्रतिशत रहा, जबकि 2007 में यह करीब 30.4 प्रतिशत था। हालांकि केवल कुल वोट शेयर के आधार पर किसी एक समुदाय के पूरे मतदान व्यवहार का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।

इसी वजह से 2027 के चुनाव से पहले BSP के पारंपरिक समर्थन आधार और अन्य दलों की दलित समुदायों में बढ़ती पहुंच पर राजनीतिक विश्लेषकों की नजर है।

2027 चुनाव में क्या होगी भूमिका?

2027 के विधानसभा चुनाव में दलित मतदाताओं की भूमिका कई कारकों पर निर्भर करेगी। इनमें उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय समस्याएं, सरकारी योजनाओं का प्रभाव, बेरोजगारी, शिक्षा, कानून-व्यवस्था, सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक गठबंधन जैसे मुद्दे शामिल हो सकते हैं।

भारतीय राजनीति में जाति आधारित मतदान को एक स्थिर पैटर्न मानना भी उचित नहीं है। अलग-अलग चुनावों में एक ही समुदाय के मतदाता अलग-अलग दलों या उम्मीदवारों को समर्थन दे सकते हैं। उत्तर प्रदेश में Jatav और non-Jatav दलितों के पिछले चुनावी रुझान इसी विविधता को दिखाते हैं।

दलित वोट केवल संख्या नहीं, सामाजिक विविधता भी

उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति को समझने के लिए केवल कुल प्रतिशत देखना पर्याप्त नहीं है। समुदाय के भीतर मौजूद सामाजिक और क्षेत्रीय विविधता भी महत्वपूर्ण है। अलग-अलग उप-समुदायों की राजनीतिक प्राथमिकताएं एक-दूसरे से अलग हो सकती हैं।

2027 के चुनाव की ओर बढ़ते हुए BJP, SP, BSP, Congress और अन्य राजनीतिक दलों की गतिविधियों में दलित समुदायों तक पहुंच बनाने की कोशिशें दिखाई दे रही हैं।

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