30 सितंबर 2026 पंजाब के अमृतसर जिले का बोहरू गांव अपने ऐतिहासिक और सामाजिक योगदान के लिए खास पहचान रखता है। इस गांव के लोगों ने धार्मिक सुधार आंदोलनों, देश के स्वतंत्रता संघर्ष और शिक्षा व स्वास्थ्य संस्थानों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गांव की पहचान केवल कृषि और ग्रामीण जीवन तक सीमित नहीं रही, बल्कि यहां से जुड़े कई लोगों ने सामाजिक जागरूकता और राष्ट्रीय आंदोलनों में भी योगदान दिया।
ननकाना साहिब साके से जुड़ा है गांव का इतिहास
बोहरू के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय ननकाना साहिब साके से जुड़ा है। गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के दौरान ऐतिहासिक गुरुद्वारों को महंतों के नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए बड़ी संख्या में सिखों ने संघर्ष किया था।
इसी आंदोलन के दौरान बोहरू गांव के रहने वाले भाई ईशर सिंह ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे 20 फरवरी 1921 को ननकाना साहिब की घटना में शहीद हुए। उन्हें सिख धर्म और इतिहास की शिक्षा मिली थी और वे धार्मिक सेवा से जुड़े रहे थे।
मास्टर सुंदर सिंह लायलपुरी का बड़ा योगदान
बोहरू गांव से जुड़े प्रमुख नामों में मास्टर सुंदर सिंह लायलपुरी कंबोज का नाम भी शामिल है। उनका जन्म 4 अप्रैल 1875 को बोहरू में हुआ था। वे शिक्षक, पत्रकार, राजनीतिक कार्यकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जाने गए।
उन्होंने हिंदू सभा स्कूल से मैट्रिक की शिक्षा प्राप्त की और बाद में खालसा कॉलेज से बीए ऑनर्स किया। इसके बाद उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज से बीटी की पढ़ाई पूरी की। दोनों उच्च परीक्षाओं में उन्होंने प्रथम स्थान हासिल किया था।
उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग ब्रिटिश शासन के दौरान सामने आया। तहसीलदार के पद के लिए इंटरव्यू के दौरान उन्होंने ब्रिटिश अधिकारी के सामने बिना अनुमति कुर्सी पर बैठने को लेकर आपत्ति का सामना किया। इसके बाद उन्होंने ब्रिटिश सरकार की नौकरी नहीं करने का फैसला किया।
गुरुद्वारा सुधार आंदोलन में निभाई भूमिका
सुंदर सिंह लायलपुरी ने खालसा भुजंगी दल की स्थापना की। इस संगठन ने गुरुद्वारा सुधार आंदोलन और देश की आजादी के संघर्ष में भूमिका निभाई।
उन्होंने 1909 में आनंद विवाह अधिनियम का मसौदा तैयार किया और इसे कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से आगे बढ़ाने में योगदान दिया। वर्ष 1914 में उन्होंने ‘सच्चा ढंडोरा’ नाम से साप्ताहिक अखबार शुरू किया, जिसके माध्यम से गुरुद्वारा सुधार, भारत की स्वतंत्रता और सिख समाज से जुड़े मुद्दों को उठाया गया।
जलियांवाला बाग के बाद भी उठाई आवाज
जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद लायलपुरी को एक मामले में डेढ़ साल की सजा और 1,200 रुपये का जुर्माना लगाया गया था। मामले में टेलीफोन तार काटने और लायलपुर रेलवे स्टेशन पर घास के ढेर में आग लगने की घटना का उल्लेख था।
पंडित मदन मोहन मालवीय ने उनके मामले को इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में उठाया। इसके बाद 23 जुलाई 1919 को सुंदर सिंह को रिहा कर दिया गया। उनका निधन 1969 में हुआ।
शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी योगदान
बोहरू की विरासत केवल राजनीतिक और धार्मिक आंदोलनों तक सीमित नहीं रही। गांव में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को विकसित करने में भी स्थानीय लोगों ने योगदान दिया।
आत्मा सिंह ने गांव में पहला स्वास्थ्य क्लिनिक स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसे बाद में ‘आत्मा सिंह जनता अस्पताल’ के नाम से जाना गया और वर्तमान में यहां सरकारी सेकेंडरी हेल्थ सेंटर संचालित है।
उन्होंने गांव में स्कूल की स्थापना में भी योगदान दिया। यह संस्थान आगे चलकर सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल के रूप में विकसित हुआ। आत्मा सिंह ने गांव के प्रवेश मार्ग पर करीब 2.5 एकड़ जमीन इन दोनों संस्थानों की स्थापना के लिए दान की थी।
आज भी विकास की जरूरत महसूस करते हैं ग्रामीण
ऐतिहासिक विरासत के साथ-साथ बोहरू आज अपनी आधुनिक जरूरतों को लेकर भी चर्चा में है। ग्रामीणों ने स्थानीय सेकेंडरी हेल्थ सेंटर के विस्तार, पुलिस चौकी को अस्पताल परिसर से बाहर स्थानांतरित करने, बैंक शाखा खोलने और गांव को वल्लाह सब्जी मंडी से जोड़ने वाली सड़क का काम जल्द पूरा करने की मांग की है।
गांव अमृतसर-चब्बा रोड पर स्थित है और ग्रामीणों के अनुसार यहां की आबादी 10 हजार से अधिक है। ऐसे में स्वास्थ्य और कनेक्टिविटी सुविधाओं का विस्तार स्थानीय लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पलायन की कहानी भी इतिहास का हिस्सा
बोहरू के इतिहास में पलायन का भी एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है। उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में ब्रिटिश शासन के दौरान कई परिवारों ने खेती के लिए बार क्षेत्र की ओर पलायन किया था। लायलपुर, शेखूपुरा और सियालकोट जैसे क्षेत्रों में जमीन मिलने के बाद बोहरू सहित आसपास के गांवों के कई परिवार वहां चले गए थे।
1947 के विभाजन ने इस प्रक्रिया को पूरी तरह बदल दिया और बड़ी संख्या में परिवारों को वापस भारत आना पड़ा। इस तरह बोहरू की कहानी सामाजिक सुधार और स्वतंत्रता संघर्ष के साथ-साथ प्रवास और विभाजन की यादों से भी जुड़ी हुई है।
विरासत और वर्तमान का संगम
बोहरू गांव की कहानी बताती है कि ग्रामीण क्षेत्र केवल कृषि गतिविधियों तक सीमित नहीं होते। धार्मिक सुधार आंदोलन, स्वतंत्रता संघर्ष, पत्रकारिता, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में गांव से जुड़े लोगों के योगदान ने इसकी पहचान को व्यापक बनाया है।
आज भी गांव के लोग अपनी ऐतिहासिक विरासत के साथ बेहतर स्वास्थ्य, सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। इसी वजह से बोहरू की कहानी अतीत की उपलब्धियों और वर्तमान की जरूरतों, दोनों को एक साथ सामने रखती है।
