30 सितंबर 2026 पंजाब के गांवों की पहचान केवल उनकी जमीन और खेती से नहीं, बल्कि वहां रहने वाले परिवारों की पीढ़ियों पुरानी कहानियों से भी जुड़ी होती है। अमृतसर के पास स्थित बोहरू गांव की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जहां बेहतर अवसरों और नई जमीन की तलाश में परिवारों के पलायन का सिलसिला कई पीढ़ियों से जारी है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, बोहरू से पलायन कब शुरू हुआ, इसका कोई स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। हालांकि, गांव के बुजुर्गों की यादों में इसकी सबसे पुरानी कड़ी 19वीं सदी के आखिरी वर्षों से जुड़ती है। उस समय ब्रिटिश सरकार ने पंजाब के कई परिवारों को खेती के लिए नए क्षेत्रों में बसने के लिए प्रोत्साहित किया था।
ब्रिटिश दौर में शुरू हुआ पलायन
19वीं सदी के अंत में ब्रिटिश प्रशासन ने उस क्षेत्र को कृषि योग्य बनाने के लिए परिवारों को जमीन आवंटित की, जिसे उस समय ‘बार एरिया’ कहा जाता था। यह इलाका पहले बड़े पैमाने पर जंगलों से घिरा हुआ था और इसे खेती के लिए विकसित करने की योजना बनाई गई थी।
बोहरू समेत आसपास के कई गांवों के परिवारों ने इस अवसर को स्वीकार किया और लायलपुर, शेखूपुरा तथा सियालकोट जैसे इलाकों में जाकर बस गए। उन्हें वहां खेती के लिए जमीन दी गई। इस तरह रोजगार और बेहतर कृषि अवसरों की तलाश में गांव से बाहर जाने की प्रक्रिया ने शुरुआती दौर में ही आकार लेना शुरू कर दिया था।
1947 के विभाजन ने बदल दी तस्वीर
इसके बाद वर्ष 1947 का भारत-पाकिस्तान विभाजन बोहरू और पूरे पंजाब के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। विभाजन के दौरान पश्चिमी पंजाब में बसे कई परिवारों को अपनी जमीन और घर छोड़कर भारत लौटना पड़ा।
बोहरू भी इस बड़े सामाजिक बदलाव से अछूता नहीं रहा। स्थानीय पूर्व सरपंच हरजीत सिंह के अनुसार, विभाजन के दौरान पाकिस्तान से करीब 25 से 30 परिवार बोहरू गांव आकर बसे। इनमें कई ऐसे परिवार भी थे, जिनके पूर्वज पहले ब्रिटिश दौर में बार एरिया की ओर पलायन कर चुके थे।
विभाजन के बाद जमीनों का पुनर्वितरण हुआ और गांवों की सामाजिक संरचना में भी बदलाव आया। अमृतसर सीमा जिला होने के कारण विभाजन के दौरान हुई हिंसा, विस्थापन और लोगों के बड़े पैमाने पर आने-जाने का असर यहां के गांवों पर भी पड़ा।
आजादी के बाद उत्तर प्रदेश की ओर रुख
पलायन का सिलसिला 1947 के बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। स्थानीय जानकारी के अनुसार, आजादी के बाद बोहरू के कुछ परिवारों ने उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि हासिल की और वहां जाकर बस गए।
इससे पता चलता है कि परिवारों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना केवल विभाजन या मजबूरी की वजह से ही नहीं था, बल्कि खेती और बेहतर आर्थिक अवसर भी इसके पीछे महत्वपूर्ण कारण रहे।
2015 के बाद विदेश जाने का नया दौर
बोहरू में पलायन का एक नया दौर वर्ष 2015 के आसपास शुरू हुआ, जब गांव के लोगों में विदेश जाने का चलन बढ़ने लगा। स्थानीय लोगों के अनुसार, इसके बाद कई परिवारों और युवाओं ने विदेशों में बेहतर अवसरों की तलाश शुरू की।
हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में इस प्रवृत्ति में कुछ कमी आने की बात भी सामने आई है। फिर भी विदेशों की ओर जाने की इच्छा ने गांव की सामाजिक और आर्थिक तस्वीर को प्रभावित किया है।
पलायन ने गांव की सामाजिक संरचना को बदला
पीढ़ियों से जारी इस पलायन ने बोहरू जैसे गांवों की सामाजिक संरचना को भी प्रभावित किया है। एक दौर में जहां परिवार नई कृषि भूमि की तलाश में पंजाब से पश्चिमी पंजाब के क्षेत्रों की ओर गए, वहीं 1947 के बाद वही परिवार नए सिरे से भारत के विभिन्न हिस्सों में बसने के लिए मजबूर हुए।
इसके बाद रोजगार और आर्थिक अवसरों की तलाश में उत्तर प्रदेश और फिर विदेशों की ओर जाने का सिलसिला देखने को मिला। इस तरह एक ही गांव की पीढ़ियों की कहानी अलग-अलग क्षेत्रों और सीमाओं से जुड़ती चली गई।
बोहरू की कहानी में इतिहास की कई परतें
बोहरू की कहानी केवल एक गांव से लोगों के बाहर जाने की कहानी नहीं है। इसमें ब्रिटिश शासन की कृषि विस्तार नीति, 1947 का विभाजन, शरणार्थियों का पुनर्वास, जमीन का पुनर्वितरण और आधुनिक दौर में विदेश जाने की आकांक्षा जैसी कई ऐतिहासिक और सामाजिक परतें शामिल हैं।
स्थानीय परिवारों की यादों में सुरक्षित ये घटनाएं बताती हैं कि पंजाब के गांवों का इतिहास केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहा। राजनीतिक सीमाओं और आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव के साथ यहां रहने वाले परिवार भी लगातार नए स्थानों से जुड़ते रहे हैं।
परिवारों की यादों में जिंदा है पुराना इतिहास
बोहरू के पुराने परिवारों के लिए यह इतिहास केवल दस्तावेजों में दर्ज घटनाएं नहीं है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाने वाली कहानियों में उन स्थानों का जिक्र आज भी मिलता है, जहां उनके पूर्वज कभी खेती करने गए थे और फिर विभाजन के दौरान वापस लौटे।
स्थानीय इतिहास को पूरी तरह समझने के लिए शरणार्थी रिकॉर्ड, जमीन से जुड़े दस्तावेज और उन परिवारों की मौखिक परंपराओं का अध्ययन जरूरी होगा, जिन्होंने इन घटनाओं को खुद देखा या अपने बुजुर्गों से उनके बारे में सुना।
