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विश्वविद्यालयों को सार्वजनिक नीति बनाने में मदद करनी चाहिए: स्पीकर विजेंद्र गुप्ता

23 अगस्त 2026 दिल्ली विधानसभा के स्पीकर विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि विश्वविद्यालयों को केवल शिक्षा और शोध तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सार्वजनिक नीति तैयार करने में सरकार और विधायिकाओं की सक्रिय भागीदार बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय शोध आधारित सुझाव, विशेषज्ञ राय और जमीनी स्तर के प्रमाण उपलब्ध कराकर बेहतर कानून और नीतियां बनाने में मदद कर सकते हैं।

वीसी कॉन्क्लेव में बोले विजेंद्र गुप्ता

गुप्ता ने फरीदाबाद स्थित मानव रचना इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च एंड स्टडीज में आयोजित वाइस चांसलर्स कॉन्क्लेव 2026 के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए यह बात कही। दो दिवसीय कॉन्क्लेव 22 और 23 अगस्त को आयोजित किया जा रहा है और इसकी थीम ‘ग्रीन कैंपस: सस्टेनेबल और रेजिलिएंट भविष्य के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों को सशक्त बनाना’ है।

अच्छे कानूनों के लिए जरूरी है विश्वसनीय शोध

विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि अच्छे कानून बनाने के लिए सही तथ्यों, विश्वसनीय शोध और जमीनी स्तर की जानकारी की जरूरत होती है। ऐसे में विश्वविद्यालयों को सरकार और विधायिकाओं के साथ मिलकर काम करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि विधायिकाएं कानून बनाती हैं, बजट को मंजूरी देती हैं और सरकारों की जवाबदेही तय करती हैं, जबकि विश्वविद्यालय अपने शोध और छात्रों की लोकतांत्रिक संस्थाओं में भागीदारी के जरिए इन प्रक्रियाओं को मजबूत कर सकते हैं।

पर्यावरणीय चुनौतियों पर जताई चिंता

स्पीकर ने दिल्ली-NCR में बढ़ती गर्मी, सर्दियों में स्मॉग, वायु प्रदूषण, अचानक आने वाली बाढ़ और गिरते भूजल स्तर जैसी समस्याओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ये समस्याएं केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों से भी जुड़ी हैं।

उन्होंने विश्वविद्यालयों से पर्यावरण संरक्षण में उदाहरण बनने की अपील करते हुए कहा कि यदि भारत के विश्वविद्यालय ग्रीन नहीं होंगे तो देश का भविष्य ग्रीन कैसे होगा।

विश्वविद्यालय बनें ग्रीन ट्रांजिशन के मॉडल

गुप्ता ने कहा कि विश्वविद्यालय भारत के ग्रीन ट्रांजिशन में तीन महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा सकते हैं—मॉडल, शिक्षक और शोध एवं समाधान केंद्र के रूप में।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों के कैंपस छोटे शहरों की तरह होते हैं, जहां बिजली, पानी, परिवहन, भोजन, इमारत और कचरा प्रबंधन जैसी व्यवस्थाएं होती हैं। इसलिए कैंपस में सौर ऊर्जा, वर्षा जल संचयन, जल संरक्षण, कचरा पृथक्करण और ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी व्यवस्थाओं को लागू करके उदाहरण पेश किया जा सकता है।

रिसर्च को लैब से जमीन तक पहुंचाने की जरूरत

स्पीकर ने विश्वविद्यालयों में ऐसे शोध पर जोर दिया जो भारतीय परिस्थितियों के लिए व्यावहारिक समाधान तैयार कर सके। उन्होंने सस्ती सौर तकनीक, पानी की कम खपत वाली कृषि, ग्रीन कंस्ट्रक्शन सामग्री और एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग जैसे क्षेत्रों में शोध की जरूरत बताई।

उन्होंने कहा कि शोध का लाभ केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे खेत, मोहल्ले और नगर निकायों की व्यवस्था तक पहुंचना चाहिए।

ग्रीन कैंपस के लिए तय हों लक्ष्य

गुप्ता ने विश्वविद्यालयों से अक्षय ऊर्जा के इस्तेमाल, पानी के पुनर्चक्रण और कार्बन उत्सर्जन में कमी के लिए समयबद्ध और मापने योग्य लक्ष्य तय करने का आह्वान किया। उन्होंने इन लक्ष्यों की सालाना समीक्षा करने की भी बात कही।

उन्होंने यह सुझाव भी दिया कि वाइस चांसलर्स कॉन्क्लेव को एक स्थायी वार्षिक मंच बनाया जाए, जहां विश्वविद्यालय अपने सफल पर्यावरणीय मॉडल साझा कर सकें और उत्कृष्ट ग्रीन कैंपस को पहचान दी जा सके।

कुल मिलाकर, स्पीकर विजेंद्र गुप्ता ने विश्वविद्यालयों से शिक्षा और शोध की पारंपरिक भूमिका से आगे बढ़कर सार्वजनिक नीति, पर्यावरण और सामाजिक समस्याओं के समाधान में सक्रिय योगदान देने की अपील की है।

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