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ओटीटी से हटाई गई ‘सतलुज’ फिल्म की पंजाब के गांवों में सार्वजनिक स्क्रीनिंग शुरू

8 जुलाई 2026 :  मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और संघर्ष पर आधारित पंजाबी फिल्म ‘सतलुज’ को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद पंजाब के कई गांवों में इसकी सार्वजनिक स्क्रीनिंग आयोजित की जा रही है। विभिन्न सामाजिक संगठनों, स्थानीय पंचायतों और युवाओं के सहयोग से गांव-गांव में लोगों को यह फिल्म दिखाई जा रही है।

फिल्म की स्क्रीनिंग को लेकर लोगों में उत्साह देखा जा रहा है। आयोजकों का कहना है कि उनका उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों तक फिल्म का संदेश पहुंचाना है ताकि नई पीढ़ी पंजाब के इतिहास और मानवाधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को समझ सके। कई गांवों में बड़ी संख्या में ग्रामीण, छात्र, महिलाएं और बुजुर्ग इस फिल्म को देखने पहुंचे।

ओटीटी प्लेटफॉर्म से फिल्म हटने के बाद लोगों में इसे देखने की उत्सुकता और बढ़ गई है। इसी कारण गांवों में प्रोजेक्टर और एलईडी स्क्रीन लगाकर सामूहिक प्रदर्शन किए जा रहे हैं। कई स्थानों पर स्क्रीनिंग के बाद चर्चा सत्र भी आयोजित किए गए, जहां लोगों ने फिल्म में उठाए गए विषयों पर अपने विचार साझा किए।

फिल्म ‘सतलुज’ मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के संघर्ष और न्याय की उनकी लड़ाई पर आधारित है। इसमें पंजाब के इतिहास के संवेदनशील दौर और मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से दिखाया गया है। समर्थकों का कहना है कि इस तरह की फिल्में समाज को इतिहास के महत्वपूर्ण पहलुओं से परिचित कराती हैं।

पंजाब के अलग-अलग जिलों में सामाजिक संगठनों ने आने वाले दिनों में भी सार्वजनिक स्क्रीनिंग जारी रखने की घोषणा की है। उनका कहना है कि जिन लोगों को ओटीटी पर फिल्म देखने का अवसर नहीं मिला, उन्हें गांव स्तर पर यह फिल्म दिखाई जाएगी। कई स्वयंसेवी संस्थाएं भी इस अभियान से जुड़ रही हैं।

कुछ स्थानों पर स्क्रीनिंग के दौरान मानवाधिकार, लोकतांत्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे विषयों पर भी चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि समाज को ऐसे विषयों पर खुलकर संवाद करना चाहिए ताकि लोगों में जागरूकता बढ़े। वहीं कई ग्रामीणों ने फिल्म देखने के बाद कहा कि उन्हें पंजाब के इतिहास के बारे में नई जानकारी मिली।

फिल्म के समर्थन में कई स्थानीय संगठनों ने कहा कि सांस्कृतिक और सामाजिक विषयों पर बनी फिल्मों तक लोगों की पहुंच बनी रहनी चाहिए। उनका मानना है कि यदि किसी कारणवश फिल्म डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध नहीं है, तो वैधानिक और सार्वजनिक माध्यमों से लोगों तक उसकी पहुंच सुनिश्चित की जा सकती है।

फिल्म को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के कारणों को लेकर अलग-अलग तरह की चर्चाएं भी सामने आई हैं। हालांकि, इस संबंध में आधिकारिक स्तर पर जो भी जानकारी उपलब्ध होगी, उसी के आधार पर अंतिम स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के दौर में भी सामुदायिक स्क्रीनिंग लोगों को एक साथ जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन सकती है। गांवों में आयोजित ऐसे कार्यक्रम न केवल फिल्म देखने का अवसर प्रदान करते हैं बल्कि सामाजिक संवाद और जागरूकता को भी बढ़ावा देते हैं।

आने वाले दिनों में पंजाब के कई अन्य गांवों में भी ‘सतलुज’ की सार्वजनिक स्क्रीनिंग आयोजित किए जाने की तैयारी चल रही है। आयोजकों का कहना है कि उनका उद्देश्य फिल्म के माध्यम से इतिहास, मानवाधिकार और सामाजिक जागरूकता से जुड़े मुद्दों पर रचनात्मक चर्चा को बढ़ावा देना है।

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