19 सितंबर, 2026 : महाराष्ट्र में अगस्त और सितंबर के दौरान बारिश में कमी के कारण सूखे जैसे हालात की चिंता बढ़ गई है। भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में 1 जून से 18 सितंबर तक सामान्य के मुकाबले करीब 17 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। सबसे ज्यादा कमी मराठवाड़ा में 35 फीसदी और विदर्भ में 28 फीसदी दर्ज की गई है।
राज्य के कई हिस्सों में लंबे समय तक बारिश नहीं होने के कारण पानी की उपलब्धता, खेती और पशुधन को लेकर चिंता बढ़ रही है। इसी को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने संभावित टंचाई की स्थिति से निपटने के लिए तैयारियां तेज कर दी हैं।
महाराष्ट्र में बारिश की कमी ने बढ़ाई चिंता
मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र में इस मानसून सीजन के दौरान बारिश का वितरण भी असमान रहा है। राज्य में कुल 17 फीसदी बारिश की कमी दर्ज की गई है। सोलापुर में 1 जून से 18 सितंबर के बीच सबसे ज्यादा 57 फीसदी बारिश की कमी दर्ज की गई।
मराठवाड़ा में बारिश की कमी 35 फीसदी रही, जबकि विदर्भ में 28 फीसदी की कमी दर्ज की गई। कोकण क्षेत्र में कुल बारिश की कमी 12 फीसदी रही, हालांकि इस क्षेत्र के अलग-अलग जिलों में स्थिति अलग रही। पालघर में अतिरिक्त बारिश दर्ज हुई, जबकि सिंधुदुर्ग में 35 फीसदी बारिश की कमी रही।
मराठवाड़ा में सबसे ज्यादा असर
मराठवाड़ा इस समय बारिश की कमी से प्रभावित प्रमुख क्षेत्रों में शामिल है। लंबे अंतराल के बाद बीड, लातूर, नांदेड, परभणी और हिंगोली जैसे जिलों में बारिश हुई। रिपोर्ट के अनुसार, क्षेत्र के 31 राजस्व मंडलों में अतिवृष्टि भी दर्ज की गई और पिछले 24 घंटों में क्षेत्र में औसतन 17.1 मिलीमीटर बारिश हुई।
हालांकि, कुछ इलाकों में बारिश होने के बावजूद पूरे क्षेत्र में बारिश का वितरण समान नहीं रहा है। इसी वजह से सरकार संभावित जल संकट और कृषि नुकसान को लेकर जिलास्तर पर स्थिति की समीक्षा कर रही है।
सरकार ने शुरू की टंचाई से निपटने की तैयारी
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के अनुसार, राज्य सरकार ने केंद्र से मदद का इंतजार किए बिना संभावित सूखे की स्थिति से निपटने के उपाय शुरू कर दिए हैं। उन्होंने कहा कि किसानों के लिए प्रत्यक्ष सहायता, पीने के पानी और चारे जैसी जरूरतों को लेकर योजना बनाई जा रही है।
सरकार ने सभी जिलों के पालकमंत्रियों को अपने-अपने क्षेत्रों में संभावित टंचाई की स्थिति का आकलन करने के निर्देश दिए हैं। जिलों से मिलने वाली रिपोर्ट के आधार पर आगे की राहत और निवारण संबंधी फैसले लिए जाएंगे।
कृषि मंत्री करेंगे प्रभावित क्षेत्रों का दौरा
महाराष्ट्र के कृषि मंत्री दत्तात्रय भरणे भी प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करेंगे। वे छत्रपति संभाजीनगर और अमरावती राजस्व विभाग के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में जाकर फसलों की स्थिति का जायजा लेंगे।
सरकार की ओर से जिला प्रशासन और राजस्व विभाग को कृषि नुकसान का सर्वेक्षण करने के लिए तैयार रहने को कहा गया है। इससे प्रभावित क्षेत्रों और किसानों को हुए संभावित नुकसान का आकलन करने में मदद मिलेगी।
पेयजल व्यवस्था पर विशेष ध्यान
संभावित टंचाई की स्थिति में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पेयजल की समस्या गंभीर न हो, इसके लिए पानी की आपूर्ति करने वाली योजनाओं की जांच और रखरखाव के निर्देश दिए गए हैं।
सरकार ने संबंधित विभागों से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि बिजली बिल की बकाया राशि या बिजली संयंत्रों में खराबी के कारण पानी की आपूर्ति प्रभावित न हो। जहां जरूरी हो, वहां पानी की आपूर्ति से जुड़े संयंत्रों की तत्काल मरम्मत करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
पशुधन के लिए चारे की व्यवस्था
बारिश की कमी का असर केवल फसलों तक सीमित नहीं है। संभावित जल संकट के साथ पशुधन के लिए चारे की उपलब्धता भी एक महत्वपूर्ण चिंता बन सकती है।
इसी को देखते हुए सरकार ने जिलावार चारे की उपलब्धता बनाए रखने के लिए योजना तैयार करने को कहा है। इससे सूखे जैसे हालात में किसानों और पशुपालकों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने की कोशिश की जा रही है।
क्या 17 फीसदी बारिश की कमी को सूखा माना जाएगा?
रिपोर्ट के अनुसार, केवल बारिश में कमी के आधार पर किसी क्षेत्र को सूखाग्रस्त घोषित नहीं किया जाता। इसके लिए पानी के मौजूदा भंडार, भूजल स्तर और अन्य परिस्थितियों को भी देखा जाता है।
मौसम विभाग के मानकों के अनुसार, जब किसी क्षेत्र में दीर्घकालीन औसत के मुकाबले बारिश की कमी 26 फीसदी या उससे अधिक होती है, तब सूखे की स्थिति के आकलन में इसे महत्वपूर्ण माना जाता है। 26 से 50 फीसदी कमी को मध्यम और 50 फीसदी से अधिक कमी को गंभीर सूखे की स्थिति के रूप में देखा जाता है।
आगे क्या होगा?
राज्य सरकार अब जिलों से मिलने वाली रिपोर्ट के आधार पर आगे की रणनीति तैयार करेगी। पालकमंत्रियों को स्थिति का जायजा लेने के निर्देश दिए गए हैं और कृषि मंत्री प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करेंगे।
इसके बाद आगामी मंत्रिमंडल बैठक में संभावित टंचाई से निपटने के लिए आवश्यक कदमों पर फैसला लिया जा सकता है। फिलहाल सरकार का फोकस किसानों की सहायता, पेयजल व्यवस्था, फसल नुकसान के आकलन और पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता बनाए रखने पर है।
