3 सितंबर 2026 पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा- अभियोजन की लापरवाही के कारण आरोपी को अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता, पूछा- बाद में बरी होने पर नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने लंबे समय तक विचाराधीन कैदी को जेल में रखने को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। जस्टिस संजय वशिष्ठ ने एक ड्रग्स केस में जमानत देते हुए सवाल उठाया कि अगर कोई आरोपी कई साल जेल में रहने के बाद अंततः बरी हो जाता है, तो उसकी व्यक्तिगत जिंदगी, आजादी, परिवार और भविष्य के करियर को हुए अपूरणीय नुकसान की भरपाई कौन करेगा।
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि अभियोजन पक्ष की लापरवाही या चूक के कारण किसी आरोपी को अनिश्चितकाल तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य को लंबे समय तक चलने वाली हिरासत के प्रभावों के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए और इस मामले को सामान्य या लापरवाह तरीके से नहीं देखा जा सकता।
9 महीने से ज्यादा समय तक एक भी गवाह पेश नहीं हुआ
जस्टिस संजय वशिष्ठ ने यह टिप्पणी पटियाला जिले के शंभू थाने में 28 मार्च 2025 को NDPS Act के तहत दर्ज एक ड्रग्स मामले में की। आरोपी की दूसरी नियमित जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि मामले में 18 नवंबर 2025 को आरोप तय किए गए थे, लेकिन उसके बाद नौ महीने से अधिक समय तक अभियोजन पक्ष एक भी गवाह को पेश नहीं कर सका।
अदालती कार्यवाही के दौरान 11 तारीखों पर रिकॉर्ड में यह दर्ज किया गया कि कोई अभियोजन गवाह मौजूद नहीं था। इसके बावजूद मामले में सुनवाई लगातार टलती रही। अब अभियोजन पक्ष के गवाहों को बुलाने के लिए 24 सितंबर की तारीख तय की गई थी।
अभियोजन की गलती का खामियाजा आरोपी क्यों भुगते?
हाईकोर्ट ने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए सवाल किया कि क्या अभियोजन पक्ष की चूक के कारण किसी आरोपी को अनिश्चित अवधि तक जेल में रखा जा सकता है, खासकर तब जब जिन गवाहों की जांच होनी है, वे सरकारी अधिकारी हैं और मुकदमे में देरी आरोपी की वजह से नहीं हुई है।
कोर्ट ने कहा कि जब आरोपी पहले ही काफी समय हिरासत में बिता चुका हो और मुकदमे में बार-बार अवसर मिलने के बावजूद कोई वास्तविक प्रगति नहीं हुई हो, तो जमानत के सवाल पर इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर कोर्ट ने जताई चिंता
हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व को भी रेखांकित किया। कोर्ट के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति को लंबे समय तक हिरासत में रखा जाता है और बाद में यह हिरासत अनुचित साबित होती है, तो बाद में दिया गया कोई आदेश उस नुकसान की पूरी तरह भरपाई नहीं कर सकता।
जस्टिस वशिष्ठ ने कहा कि लंबे समय तक स्वतंत्रता से वंचित रहने का असर केवल आरोपी तक सीमित नहीं रहता। उसके परिवार पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है, खासकर तब जब परिवार की आर्थिक जरूरतें आरोपी की आय पर निर्भर हों।
आरोपी के चार नाबालिग बच्चे भी हैं
कोर्ट के सामने यह तथ्य भी आया कि याचिकाकर्ता के चार नाबालिग बच्चे हैं, जो उस पर निर्भर हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की हिरासत के प्रभावों को केवल उसके व्यक्तिगत नजरिए से नहीं देखा जा सकता। उसके परिवार के सदस्यों पर पड़ने वाले सामाजिक और आर्थिक प्रभावों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
कोर्ट ने राज्य को यह याद दिलाया कि लंबे समय तक चलने वाली हिरासत के व्यापक प्रभावों को लेकर वह उदासीन रवैया नहीं अपना सकता।
केवल गिरफ्तारी करना ही आपराधिक न्याय व्यवस्था का उद्देश्य नहीं
हाईकोर्ट ने आपराधिक न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी को लेकर भी अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली का उद्देश्य केवल किसी ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करना नहीं है, जिसके खिलाफ अपराध करने का आरोप लगाया गया हो।
राज्य और अभियोजन एजेंसी की भी जिम्मेदारी है कि मुकदमे को पूरी गंभीरता और उचित गति से आगे बढ़ाया जाए और अनावश्यक देरी के बिना उसे उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए।
अभियोजन अपनी ही लापरवाही का फायदा नहीं उठा सकता
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष को अपनी ही चूक का लाभ लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती, खासकर तब जब उस चूक का सीधा असर आरोपी की लगातार हिरासत पर पड़ रहा हो।
इस मामले में कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी की पहली जमानत याचिका 25 मार्च को खारिज हो चुकी थी। इसके बाद दूसरी जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान मुकदमे की प्रगति और आरोपी द्वारा बिताए गए हिरासत के समय को महत्वपूर्ण माना गया।
न्यायिक प्रक्रिया में समय पर सुनवाई जरूरी
हाईकोर्ट की यह टिप्पणी आपराधिक मामलों में समय पर सुनवाई और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन के महत्व को सामने लाती है। किसी आरोपी पर गंभीर अपराध का आरोप होना अपने आप में इस बात का आधार नहीं बन सकता कि मुकदमे की प्रगति के बिना उसे अनिश्चितकाल तक जेल में रखा जाए।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि गंभीर अपराधों में आरोपी को स्वतः जमानत मिल जाएगी। अदालत प्रत्येक मामले के तथ्यों, आरोपों, हिरासत की अवधि, मुकदमे की प्रगति और अन्य कानूनी परिस्थितियों को देखकर निर्णय लेती है।
