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जंतर-मंतर प्रदर्शन में दिल्ली पुलिस के फेसियल रिकग्निशन इस्तेमाल के खिलाफ याचिका पर SC सुनवाई को तैयार

13 अगस्त, 2026 : सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा कथित तौर पर फेसियल रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है। याचिका में प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए इस तकनीक के इस्तेमाल को लेकर निजता और मौलिक अधिकारों से जुड़े गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में शामिल लोगों की पहचान करने के लिए फेसियल रिकग्निशन सिस्टम का इस्तेमाल किया। याचिकाकर्ता का कहना है कि ऐसी तकनीक के इस्तेमाल से नागरिकों की निजता प्रभावित हो सकती है और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के अधिकार पर भी असर पड़ सकता है।

फेसियल रिकग्निशन तकनीक किसी व्यक्ति के चेहरे की डिजिटल तस्वीर या वीडियो फुटेज का विश्लेषण करके उसकी पहचान करने में मदद करती है। पुलिस और अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसियां इसका इस्तेमाल संदिग्ध व्यक्तियों की पहचान और जांच में कर सकती हैं। हालांकि, सार्वजनिक स्थानों पर बड़े पैमाने पर इस तकनीक के इस्तेमाल को लेकर भारत में निजता और डेटा सुरक्षा से जुड़े सवाल लगातार उठते रहे हैं।

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल लोगों की पहचान के लिए ऐसी तकनीक का इस्तेमाल करने से पहले कानूनी आधार और उचित प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए।

मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने और अपनी बात रखने का अधिकार देता है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट पहले ही निजता के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दे चुका है।

याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि क्या प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए फेसियल रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल बिना पर्याप्त कानूनी सुरक्षा उपायों के किया जा सकता है। इसके अलावा, इस तकनीक से एकत्र किए गए चेहरे के डेटा को कितने समय तक रखा जाता है और उसका इस्तेमाल किन उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है, इस पर भी स्पष्टता की मांग की गई है।

फेसियल रिकग्निशन को लेकर सबसे बड़ी चिंता डेटा की सुरक्षा और संभावित दुरुपयोग से जुड़ी है। यदि किसी व्यक्ति की पहचान सार्वजनिक प्रदर्शन में उसकी मौजूदगी के आधार पर की जाती है, तो इससे उसके राजनीतिक या सामाजिक गतिविधियों से जुड़े रिकॉर्ड तैयार होने की आशंका पैदा हो सकती है।

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत के सामने यह मुद्दा उठाया गया है कि नागरिकों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने के कारण निगरानी या पहचान संबंधी तकनीक के इस्तेमाल का सामना नहीं करना चाहिए, जब तक इसके लिए स्पष्ट कानूनी आधार मौजूद न हो।

दूसरी ओर, कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है। सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शन के दौरान पुलिस सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन और संभावित अपराधों की जांच के लिए तकनीकी साधनों का इस्तेमाल कर सकती है। लेकिन ऐसे किसी भी तकनीकी उपाय के साथ नागरिकों के मौलिक अधिकारों और निजता की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान इन दोनों पहलुओं के बीच संतुलन पर चर्चा होने की संभावना है। अदालत यह भी देख सकती है कि मौजूदा कानून और नियम पुलिस को प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए फेसियल रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल की कितनी अनुमति देते हैं।

यह मामला भारत में पुलिसिंग और आधुनिक निगरानी तकनीक के इस्तेमाल के व्यापक मुद्दे से भी जुड़ा है। देश में CCTV कैमरों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित पहचान प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। ऐसे में इनके इस्तेमाल के लिए पारदर्शिता, जवाबदेही और डेटा सुरक्षा से जुड़े स्पष्ट नियमों की जरूरत पर बहस तेज हुई है।

जंतर-मंतर दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख स्थल है। यहां विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और नागरिक संगठन अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते रहे हैं। ऐसे स्थान पर फेसियल रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल का मामला सीधे तौर पर प्रदर्शन के अधिकार और निजता के अधिकार के बीच संतुलन से जुड़ जाता है।

अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर नजर रहेगी। अदालत के सामने यह महत्वपूर्ण सवाल होगा कि सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा फेसियल रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल के लिए किस तरह की कानूनी प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय जरूरी हैं।

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताना इस मामले में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। आगे की सुनवाई में अदालत इस तकनीक के इस्तेमाल, नागरिकों की निजता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार से जुड़े पहलुओं पर विचार कर सकती है।

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