6 सितंबर 2026 पंजाब और हरियाणा सरकारों ने न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र 60 साल से बढ़ाकर 62 साल करने के प्रस्ताव का विरोध किया है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने दोनों राज्यों में न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने के पक्ष में राय दी थी, लेकिन राज्य सरकारों ने इस प्रस्ताव पर सहमति नहीं जताई। मामला अब सुप्रीम कोर्ट के सामने है।
पंजाब सरकार ने क्या कहा?
पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि राज्य में न्यायिक अधिकारियों की मौजूदा सेवानिवृत्ति उम्र 60 साल कानूनी रूप से वैध है और फिलहाल इसमें बदलाव की आवश्यकता नहीं है।
सरकार का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था के तहत न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति 60 वर्ष की उम्र में होती है और इस व्यवस्था को बदलने का फिलहाल कोई पर्याप्त आधार नहीं है।
हरियाणा ने भी प्रस्ताव का किया विरोध
हरियाणा सरकार ने भी न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने के प्रस्ताव का विरोध किया है। राज्य सरकार ने दोहराया कि वह न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति उम्र को 60 साल से आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं है।
इस तरह पंजाब और हरियाणा दोनों राज्यों ने अपने-अपने जवाब में न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति उम्र 62 साल करने के प्रस्ताव पर असहमति जताई है।
हाईकोर्ट ने 62 साल करने के पक्ष में दी थी राय
मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट समेत कई हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति उम्र बढ़ाकर 62 साल करने का समर्थन किया है।
कुछ हाईकोर्ट ने यह भी सुझाव दिया है कि मौजूदा रिटायरमेंट उम्र के बाद न्यायिक अधिकारियों को सेवा में बनाए रखने का फैसला उनके प्रदर्शन के आकलन के आधार पर किया जा सकता है।
इसका उद्देश्य अनुभवी न्यायिक अधिकारियों की सेवाओं का लंबे समय तक इस्तेमाल करना और न्यायिक व्यवस्था में उनके अनुभव का लाभ उठाना बताया जा रहा है।
कई राज्यों ने भी जताई असहमति
पंजाब और हरियाणा के अलावा असम, बिहार, केरल, मणिपुर, मेघालय, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड समेत कई अन्य राज्यों ने भी न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति उम्र 62 साल करने के प्रस्ताव का विरोध किया है।
कुछ राज्यों ने इस प्रस्ताव पर विचार के लिए और समय मांगा है, जबकि कुछ राज्यों ने अभी अपना अंतिम रुख स्पष्ट नहीं किया है।
केवल सात राज्यों ने दी सहमति
रिपोर्ट के मुताबिक, केवल सात राज्यों—छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, सिक्किम, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल—ने न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाकर 62 साल करने पर सहमति जताई है।
इन राज्यों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों की सेवा शर्तों में आवश्यक संशोधन करने को कहा है।
राज्यों ने आर्थिक बोझ का भी उठाया मुद्दा
रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने का विरोध करने वाले राज्यों की प्रमुख चिंताओं में राज्य के खजाने पर संभावित अतिरिक्त बोझ भी शामिल है। कुछ राज्यों ने यह तर्क दिया कि यदि न्यायिक अधिकारियों की सेवा अवधि बढ़ाई जाती है तो अन्य सरकारी कर्मचारी भी समान व्यवस्था की मांग कर सकते हैं।
इसके अलावा यह आशंका भी जताई गई है कि सेवा में अतिरिक्त वर्षों तक बने रहने से नए अधिकारियों और न्यायिक सेवा में प्रवेश करने वाले युवाओं के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से पुनर्विचार को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर के अपने आदेश में प्रस्ताव पर सहमति नहीं जताने वाले राज्यों से अपने रुख पर पुनर्विचार करने को कहा है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 1 अक्टूबर की तारीख तय की है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की ओर से अतिरिक्त आर्थिक बोझ को लेकर जताई गई चिंताओं को उचित आधार नहीं माना। अदालत के अनुसार, यदि अनुभवी न्यायिक अधिकारियों को 62 साल तक सेवा में रहने की अनुमति दी जाती है तो उनके सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले लाभों का भुगतान भी उसी अनुपात में आगे टल जाएगा।
आगे क्या होगा?
अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। पंजाब और हरियाणा समेत जिन राज्यों ने प्रस्ताव का विरोध किया है, उन्हें अपने रुख पर पुनर्विचार करने के लिए कहा गया है।
अदालत की अगली सुनवाई के दौरान राज्यों के जवाब और न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति उम्र बढ़ाने से जुड़े प्रशासनिक, आर्थिक और न्यायिक पहलुओं पर आगे चर्चा हो सकती है।
