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ट्रायल में गवाही देने नहीं पहुंचा पुलिसकर्मी, जमानत का विरोध करने हाईकोर्ट पहुंचा; HC ने कहा- ‘यहीं से गिरफ्तार करो’

4 सितंबर 2026 पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस अधिकारी के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने पाया कि जांच अधिकारी ट्रायल कोर्ट में गवाही देने के लिए लगातार उपस्थित नहीं हो रहा था, जबकि उसी मामले में आरोपी की जमानत याचिका का विरोध करने के लिए वह हाईकोर्ट में मौजूद था।

जस्टिस आलोक जैन ने पुलिस अधिकारी के इस रवैये को गंभीरता से लेते हुए कहा कि यह ऐसा मामला है जिसमें अधिकारी को कोर्ट परिसर से ही गिरफ्तार किया जाना चाहिए, ताकि यह स्पष्ट संदेश जाए कि न्यायिक आदेशों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जा सकती। हालांकि, अधिकारी की बिना शर्त माफी और आगे ट्रायल कोर्ट में पेश होने के आश्वासन को देखते हुए हाईकोर्ट ने उसे अंतिम अवसर दिया।

ट्रायल कोर्ट में पेश नहीं हुआ जांच अधिकारी

मामला तरनतारन से जुड़ा है। अदालत के सामने रिकॉर्ड रखा गया कि तरनतारन के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने 17 अगस्त को संबंधित सहायक उप निरीक्षक (ASI) के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए थे।

इसके बावजूद पुलिस अधिकारी हाईकोर्ट में उस समय मौजूद था, जब आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई हो रही थी। हाईकोर्ट ने इसे बेहद असामान्य स्थिति माना और पुलिस अधिकारियों की अदालत के आदेशों का पालन करने की जिम्मेदारी पर सवाल उठाए।

गवाही के लिए बार-बार नहीं पहुंचा पुलिसकर्मी

हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में सरकारी गवाहों की गैरहाजिरी मुकदमों की लंबी पेंडेंसी का एक बड़ा कारण है। कई बार ट्रायल कोर्ट सरकारी अधिकारियों को गवाही के लिए बुलाता है, लेकिन वे निर्धारित तारीखों पर उपस्थित नहीं होते।

ऐसी स्थिति में पहले समन और फिर जमानती या गैर-जमानती वारंट तक जारी किए जाते हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर वारंट जारी होने के बाद भी अधिकारी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते हैं, तो इससे न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक देरी होती है।

हाईकोर्ट ने पुलिस के रवैये पर जताई नाराजगी

जस्टिस आलोक जैन ने कहा कि संबंधित अधिकारी एक तरफ ट्रायल कोर्ट के आदेश का पालन नहीं कर रहा था और दूसरी तरफ हाईकोर्ट में आरोपी की जमानत का विरोध करने के लिए मौजूद था।

कोर्ट ने इस स्थिति को ‘अजीब’ बताते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकारी एक तरह से ‘हाइड एंड सीक’ का रवैया अपना रहा था। कोर्ट के मुताबिक, अधिकारी को ट्रायल कोर्ट में अपनी गवाही दर्ज कराने के लिए उपलब्ध रहना चाहिए था, खासकर तब जब अदालत पहले ही उसे कई अवसर दे चुकी थी।

कोर्ट से गिरफ्तारी की बात क्यों कही?

हाईकोर्ट ने माना कि पुलिस अधिकारी के खिलाफ कड़ा आदेश पारित करना जरूरी था। कोर्ट ने कहा कि अगर न्यायिक आदेशों का पालन करने में इस तरह की लापरवाही जारी रहती है तो इससे अदालत की प्रक्रिया प्रभावित होती है।

इसी वजह से जस्टिस जैन ने टिप्पणी की कि यह ऐसा मामला है जिसमें अधिकारी को अदालत से ही गिरफ्तार किया जाना चाहिए था। हालांकि, अधिकारी द्वारा बिना शर्त माफी मांगने और आगे ट्रायल कोर्ट में उपस्थित होने की प्रतिबद्धता को देखते हुए कोर्ट ने उसे एक अंतिम अवसर दिया।

ASI हरजिंदर सिंह को 9 सितंबर को पेश होने का आदेश

हाईकोर्ट ने ASI हरजिंदर सिंह को 9 सितंबर 2026 को सुबह 10 बजे ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करने और अपनी गवाही दर्ज कराने का निर्देश दिया।

उन्हें अपनी गलती और ड्यूटी में हुई लापरवाही के लिए लिखित रूप से बिना शर्त माफी भी मांगनी होगी। इसके लिए उन्हें हलफनामे के माध्यम से माफी पेश करने का निर्देश दिया गया है।

वेतन से काटे जाएंगे ₹50 हजार

हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारी पर ₹50,000 की लागत भी लगाई है। यह राशि उनकी सैलरी से काटी जाएगी।

अदालत ने इस कार्रवाई के जरिए यह स्पष्ट किया कि सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल अपने विभागीय कार्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें अदालतों के आदेशों और निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया का भी पालन करना होगा।

SSP तरनतारन को भी दिए निर्देश

हाईकोर्ट ने तरनतारन के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को निर्देश दिया कि ASI द्वारा दी गई लिखित माफी को उनके अधिकार क्षेत्र के सभी पुलिस थानों में प्रसारित किया जाए। साथ ही इसे दूसरे जिलों के पुलिस अधिकारियों तक भी पहुंचाया जाए।

कोर्ट का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी गवाहों की गैरहाजिरी और अदालत के आदेशों की अनदेखी जैसी घटनाओं को गंभीरता से लिया जाए।

गवाहों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश

अदालत ने संबंधित अधिकारियों को यह भी सुनिश्चित करने के लिए कहा कि सरकारी गवाह जरूरत पड़ने पर अदालत में उपलब्ध रहें और मुकदमों को अनावश्यक रूप से स्थगित या लंबित न किया जाए।

कोर्ट ने कहा कि कार्यवाही में देरी तभी होनी चाहिए जब उसके पीछे कोई ठोस और न्यायसंगत कारण हो, जो संबंधित अधिकारी के नियंत्रण से बाहर हो।

न्यायिक प्रक्रिया में देरी पर हाईकोर्ट सख्त

इस मामले ने एक बार फिर आपराधिक मामलों में ट्रायल के दौरान सरकारी गवाहों की भूमिका और उनकी जवाबदेही का मुद्दा सामने ला दिया है। यदि जांच अधिकारी या अन्य आधिकारिक गवाह समय पर अदालत में उपस्थित नहीं होते हैं, तो इसका सीधा असर मुकदमे की सुनवाई पर पड़ता है।

हाईकोर्ट की टिप्पणी का मुख्य संदेश यही है कि अदालत के आदेशों का पालन सभी संबंधित अधिकारियों के लिए जरूरी है। केवल जमानत का विरोध करने के लिए हाईकोर्ट में उपस्थित होना और ट्रायल कोर्ट में गवाही के लिए अनुपस्थित रहना स्वीकार्य नहीं माना जा सकता।

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