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व्हीलचेयर से वॉलीबॉल टीम को कोचिंग दे रहे जालंधर के शिक्षक हरपाल सिंह, खेल के जुनून को बनाया मिसाल

9 सितंबर 2026: मुश्किल परिस्थितियां अगर हौसले को नहीं हरा पातीं तो इंसान अपनी जिंदगी को नई दिशा दे सकता है। जालंधर के सरकारी स्कूल नूरपुर के गणित शिक्षक हरपाल सिंह इसकी एक प्रेरणादायक मिसाल हैं। हादसे में दोनों पैर गंवाने के बावजूद उन्होंने खेल से अपना रिश्ता खत्म नहीं होने दिया। आज वह व्हीलचेयर पर बैठकर स्कूल की अंडर-14 वॉलीबॉल टीम को कोचिंग दे रहे हैं।

हरपाल सिंह पिछले करीब तीन वर्षों से स्कूल की वॉलीबॉल टीम को तैयार कर रहे हैं। इन दिनों वह चल रहे ‘खेड़ां वतन पंजाब दियां’ आयोजन के दौरान अपनी U-14 टीम के खिलाड़ियों को मैदान के किनारे से लगातार निर्देश देते नजर आए। वह खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें तकनीक समझाते और खेल के दौरान जरूरी रणनीति बताते हैं।

कभी राष्ट्रीय स्तर पर फुटबॉल खेलते थे हरपाल

हरपाल सिंह के लिए खेल हमेशा से जिंदगी का अहम हिस्सा रहा है। वह फुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी रहे हैं और राष्ट्रीय स्तर तक खेल चुके हैं। उनके पिता भी कुश्ती के कोच थे, इसलिए बचपन से ही उनका खेलों के प्रति लगाव रहा।

हरपाल ने बताया कि उन्होंने CBSE क्लस्टर स्तर पर राष्ट्रीय स्तर तक फुटबॉल खेला था और खेल को ही अपना करियर बनाने का सपना देखा था। लेकिन वर्ष 2006 में BSc की पढ़ाई के दौरान हुए सड़क हादसे ने उनकी जिंदगी बदल दी। इस हादसे में उन्होंने अपने दोनों पैर गंवा दिए।

हादसे के बाद पढ़ाई को बनाया अपना रास्ता

हादसे के बाद हरपाल को अपने भविष्य के बारे में नए सिरे से सोचना पड़ा। उन्होंने खेल से दूरी बनाने के बजाय शिक्षा के क्षेत्र में कदम रखा। उन्होंने MSc Physics की पढ़ाई पूरी की और इसके बाद B.Ed. किया।

बाद में वह शिक्षक बने। स्कूल में फुटबॉल खेलने के लिए मैदान की सुविधा नहीं थी, इसलिए उन्होंने वॉलीबॉल को चुना और विद्यार्थियों की टीम तैयार करना शुरू किया।

आज वह शिक्षक होने के साथ-साथ स्कूल के खिलाड़ियों के लिए कोच की भूमिका भी निभा रहे हैं।

व्हीलचेयर से कोचिंग में आती हैं चुनौतियां

हरपाल सिंह मानते हैं कि व्हीलचेयर से कोचिंग देना आसान नहीं है। कोचिंग के दौरान कई ऐसी तकनीकें होती हैं जिन्हें मैदान पर करके दिखाना पड़ता है, लेकिन उनके लिए ऐसा करना संभव नहीं है।

इसके बावजूद उन्होंने इसका समाधान निकाला। वह खिलाड़ियों को तकनीक समझाने के लिए वीडियो का इस्तेमाल करते हैं। उनके अनुसार, उनके विद्यार्थी काफी अच्छे हैं और वे उनकी बातों को समझकर तकनीक सीख लेते हैं।

उनका मानना है कि शारीरिक सीमाएं उनके जुनून के रास्ते में बाधा नहीं बन सकतीं।

रोजाना स्कूल से पहले पहुंचकर देते हैं प्रशिक्षण

हरपाल की पत्नी नवनीत कौर भी उसी स्कूल में शारीरिक शिक्षा की शिक्षिका हैं। उन्होंने बताया कि हरपाल की सबसे बड़ी ताकत उनकी नियमितता है।

वह स्कूल शुरू होने से करीब एक घंटे पहले पहुंच जाते हैं और वॉलीबॉल तथा कबड्डी टीम के खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देते हैं। उनकी नियमित मेहनत ने विद्यार्थियों में भी खेल के प्रति अनुशासन और लगन पैदा की है।

पत्नी भी मानती हैं हरपाल को प्रेरणास्रोत

नवनीत कौर के मुताबिक हरपाल की आत्मनिर्भरता और महिलाओं के प्रति उनका सम्मान उन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। दोनों की शादी वर्ष 2014 में हुई थी।

नवनीत का कहना है कि दूसरे लोग हरपाल को दिव्यांग व्यक्ति के रूप में देख सकते हैं, लेकिन उनके लिए वह बेहद आत्मनिर्भर इंसान हैं। उनके अनुसार, हरपाल को अपने रोजमर्रा के कामों के लिए किसी दूसरे व्यक्ति पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ती।

विद्यार्थियों से मिलती है हरपाल को प्रेरणा

हरपाल के लिए उनके विद्यार्थी सबसे बड़ी प्रेरणा हैं। उनका कहना है कि कई बार हम अपनी जिंदगी की परेशानियों को बहुत बड़ा समझते हैं, लेकिन बच्चों की परिस्थितियों को देखकर उन्हें महसूस होता है कि वे उससे भी कठिन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

इसी सोच के कारण वह विद्यार्थियों के साथ लगातार काम करते हैं और उन्हें खेल के साथ-साथ जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं।

पढ़ाई में भी विद्यार्थियों की उपलब्धि

हरपाल सिंह की मेहनत का असर केवल खेल के मैदान तक सीमित नहीं है। इस वर्ष उनके स्कूल के 11 विद्यार्थियों ने National Means-cum-Merit Scholarship (NMMS) परीक्षा पास की

इस उपलब्धि से यह भी सामने आता है कि हरपाल विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर ध्यान देते हैं। खेल और शिक्षा दोनों क्षेत्रों में बच्चों को आगे बढ़ाने की उनकी कोशिश लगातार जारी है।

खुद भी प्रतियोगिताओं में लेते हैं हिस्सा

हरपाल सिंह ने खेल को केवल कोचिंग तक सीमित नहीं रखा है। वह खुद भी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हैं। वह शॉटपुट में भाग लेते हैं और पिछले साल जिला स्तर पर प्रथम स्थान हासिल कर चुके हैं।

यानी जिस खेल भावना को वह अपने विद्यार्थियों में विकसित कर रहे हैं, उसे खुद भी अपनी जिंदगी में उतार रहे हैं।

खेल को सिर्फ सिखाते नहीं, जीते हैं

हरपाल सिंह की कहानी यह बताती है कि किसी हादसे के बाद जिंदगी रुक नहीं जाती। परिस्थितियां बदल सकती हैं, लेकिन लक्ष्य और जुनून को नई दिशा देकर आगे बढ़ा जा सकता है।

एक समय राष्ट्रीय स्तर पर फुटबॉल खेलने का सपना देखने वाले हरपाल आज शिक्षक और वॉलीबॉल कोच के रूप में नई पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं। व्हीलचेयर उनके लिए सीमा नहीं, बल्कि अपने विद्यार्थियों तक पहुंचने का एक माध्यम बन गई है।

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