21 अक्तूबर 2026: भिंडावास वाइल्डलाइफ सेंचुरी हरियाणा के प्रमुख आर्द्रभूमि क्षेत्रों में शामिल है। यह अंतरराष्ट्रीय महत्व की रामसर साइट होने के साथ पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण आवास भी है। यहां स्थानीय और प्रवासी पक्षियों को भोजन, आराम और प्रजनन के लिए अनुकूल वातावरण मिलता है।
पक्षी विशेषज्ञ टीके रॉय ने सेंचुरी के अधिकारियों के सहयोग से सर्वे किया। इसमें वर्ष 2026 के मैदानी निरीक्षणों की तुलना वर्ष 2025 में दर्ज घोंसलों के रिकॉर्ड से की गई। सर्वे के नतीजों में जलपक्षियों के प्रजनन व्यवहार में गिरावट सामने आई।
सर्वे के अनुसार, एक अकेले कीकर के पेड़ पर छोटे और भारतीय कॉर्मोरेंट यानी पनकौवों के कुल 12 घोंसले मिले। विशेषज्ञ के मुताबिक, एक अन्य पेड़, जहां पहले कई प्रजातियों के पक्षी मिलकर घोंसले बनाते थे, अब मौजूद नहीं था। हालांकि, उस पेड़ को हटाए जाने के कारण की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी।
कई प्रजातियों के घोंसले नहीं मिले
वर्ष 2025 में यहां बगुलों और हेरॉन प्रजातियों के 100 से अधिक मिश्रित घोंसले दर्ज किए गए थे। लेकिन वर्ष 2026 के सर्वे में बगुलों, हेरॉन, ओरिएंटल डार्टर और ब्लैक-हेडेड आइबिस के घोंसले नहीं देखे गए।
वहीं, ग्रेट कॉर्मोरेंट की प्रजनन गतिविधि तुलनात्मक रूप से बेहतर रही। सेंचुरी के अंदरूनी हिस्से में सूखे यूकेलिप्टस के पेड़ों के समूह पर इस प्रजाति के 85 घोंसले दर्ज किए गए। पिछले रिकॉर्ड में यहां 50 से अधिक घोंसले मिले थे।
यह अंतर बताता है कि सेंचुरी में सभी पक्षी प्रजातियों की स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ प्रजातियों में प्रजनन गतिविधि बनी हुई है, जबकि अन्य के घोंसलों में कमी या अनुपस्थिति देखी गई है।
वयस्क पक्षियों की मौजूदगी बनी हुई है
घोंसलों में गिरावट के बावजूद सेंचुरी में वयस्क पक्षियों की मौजूदगी दर्ज की गई। सर्वे में 25 ब्लैक-हेडेड आइबिस, 23 ओरिएंटल डार्टर, 21 भारतीय कॉर्मोरेंट, आठ छोटे कॉर्मोरेंट और 10 बड़े बगुले देखे गए। इसके अलावा पांच छोटे बगुले और 100 से अधिक ग्रेट कॉर्मोरेंट भी दर्ज किए गए।
विशेषज्ञों के अनुसार, किसी क्षेत्र में वयस्क पक्षियों की मौजूदगी और वहां उनके सफल प्रजनन के बीच अंतर होता है। पक्षी किसी आर्द्रभूमि में भोजन या आराम के लिए मौजूद रह सकते हैं, लेकिन यदि घोंसले बनाने के लिए सुरक्षित पेड़, पर्याप्त भोजन और अनुकूल जलस्तर उपलब्ध न हो, तो उनकी प्रजनन सफलता प्रभावित हो सकती है।
मौसम और घटते जलस्तर को माना जा रहा कारण
टीके रॉय ने जलपक्षियों के घोंसलों में गिरावट के संभावित कारणों में पिछले वर्षों में मानसून की कमी और देरी, अत्यधिक तापमान, आर्द्रभूमियों का सूखना, मछलियों की कम उपलब्धता, घोंसले बनाने वाले पेड़ों का नुकसान और जलवायु परिवर्तन को शामिल किया।
जलपक्षियों के लिए पानी का पर्याप्त स्तर और भोजन की उपलब्धता बेहद जरूरी है। जलक्षेत्र सिकुड़ने पर मछलियों और अन्य जलीय जीवों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इससे पक्षियों को भोजन तलाशने में अधिक कठिनाई होती है और प्रजनन के लिए उपयुक्त स्थान भी कम हो सकते हैं।
हालांकि, सर्वे में बताए गए कारण संभावित कारकों के रूप में सामने आए हैं। किसी एक कारण को घोंसलों में आई पूरी गिरावट के लिए जिम्मेदार ठहराने के लिए विस्तृत और लगातार निगरानी की आवश्यकता होगी।
मानवीय गतिविधियों से भी आवास पर दबाव
विशेषज्ञ ने अनियंत्रित पर्यटक प्रवेश, वाहनों की आवाजाही, मवेशियों की चराई, अवैध रूप से लकड़ी इकट्ठा करने और प्लास्टिक कचरा फेंकने जैसी गतिविधियों को भी संवेदनशील प्रजनन स्थलों के लिए खतरा बताया।
प्रजनन के मौसम में बार-बार होने वाली आवाजाही और शोर पक्षियों को परेशान कर सकते हैं। यदि घोंसले बनाने वाले पेड़ नष्ट होते हैं या उनके आसपास मानवीय गतिविधियां बढ़ती हैं, तो पक्षियों को सुरक्षित स्थान तलाशने में परेशानी हो सकती है।
भिंडावास जैसे संरक्षित क्षेत्र में पर्यटन और स्थानीय गतिविधियों का प्रबंधन इस तरह करना जरूरी है कि लोगों की आवाजाही और प्राकृतिक आवास के संरक्षण के बीच संतुलन बना रहे।
संरक्षण के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत
विशेषज्ञ ने सेंचुरी के प्राकृतिक आवास को बहाल करने और संरक्षण के लिए तत्काल उपाय करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। इसके तहत जलस्तर और पानी की गुणवत्ता की नियमित निगरानी, घोंसले बनाने वाले पेड़ों का संरक्षण, कचरे पर नियंत्रण और संवेदनशील क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित करने जैसे कदम महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
पक्षियों के घोंसलों और प्रजनन गतिविधियों का हर साल वैज्ञानिक तरीके से रिकॉर्ड रखना भी जरूरी है, ताकि यह पता चल सके कि गिरावट अस्थायी है या लंबे समय से जारी समस्या का संकेत है।
भिंडावास वाइल्डलाइफ सेंचुरी में सामने आए ये नतीजे आर्द्रभूमियों के संरक्षण की अहमियत को रेखांकित करते हैं। यदि पानी, भोजन और सुरक्षित प्रजनन स्थलों की उपलब्धता में सुधार नहीं हुआ, तो स्थानीय और प्रवासी पक्षियों की आबादी पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है।
