17 अगस्त 2026 : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा है कि FIR दर्ज होने के बाद से गिरफ्तारी से बच रहे आरोपी को उन सह-आरोपियों के साथ समानता (parity) का लाभ नहीं दिया जा सकता, जो गिरफ्तार होकर मुकदमे का सामना कर रहे हैं। अदालत ने फरार आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
न्यायमूर्ति आराधना सावनी की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता की स्थिति गिरफ्तार किए जा चुके सह-आरोपियों से बिल्कुल अलग है। जांच एजेंसी के लगातार प्रयासों के बावजूद आरोपी अब तक गिरफ्तारी से बचता रहा है।
अदालत ने कहा कि FIR दर्ज होने के बाद से आरोपी फरार है और जांच एजेंसी उसे पकड़ने के लिए लगातार प्रयास करती रही, लेकिन अभी तक उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सका। इस कारण वह उन सह-आरोपियों के समान स्थिति में नहीं है, जो पुलिस की गिरफ्त में आ चुके हैं और ट्रायल का सामना कर रहे हैं।
यह मामला 31 मई 2024 को बल्लभगढ़ के आदर्श नगर थाने में दर्ज FIR से जुड़ा है। आरोपी पर अपहरण और अन्य गंभीर अपराधों के साथ-साथ POCSO Act के तहत भी आरोप लगाए गए थे। शिकायत एक नाबालिग लड़की के पिता की ओर से की गई थी। आरोपों में लड़की के अपहरण, यौन उत्पीड़न और उसकी तस्वीरें वायरल करने की धमकी देने की बात शामिल थी।
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि जांच में प्राप्त स्कूल रिकॉर्ड के अनुसार पीड़िता की जन्मतिथि 25 मई 2009 थी। इसके आधार पर कथित घटना के समय उसकी उम्र करीब 15 वर्ष थी। जांच के दौरान आरोपी को कथित तौर पर दी गई मोबाइल फोन को भी पुलिस ने अपने कब्जे में लिया था।
पुलिस जांच में मोबाइल के कॉल डिटेल रिकॉर्ड भी सामने आए, जिनसे आरोपी और पीड़िता के बीच नियमित फोन संपर्क होने की बात सामने आई। मामले में दो अन्य आरोपियों को सितंबर 2024 में गिरफ्तार किया गया था। उनके खिलाफ चालान पेश किया जा चुका है और अदालत में आरोप भी तय किए जा चुके हैं।
जब हाईकोर्ट में याचिका पर सुनवाई हुई, तब अभियोजन पक्ष के 33 गवाहों में से छह की गवाही हो चुकी थी। महत्वपूर्ण रूप से शिकायतकर्ता और पीड़िता दोनों ने अदालत में अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं किया।
याचिकाकर्ता की ओर से इसी आधार पर सह-आरोपियों के साथ समानता का लाभ देने की दलील दी गई थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने कहा कि केवल इसलिए कि शिकायतकर्ता और पीड़िता बाद में अभियोजन के पक्ष में नहीं रहीं, फरार आरोपी को गिरफ्तार सह-आरोपियों के बराबर नहीं माना जा सकता। आरोपी ने न तो पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया और न ही जांच एजेंसी के प्रयासों के बावजूद गिरफ्तार हुआ।
पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि मामला गंभीर अपराध से जुड़ा है। अदालत के अनुसार, अन्य आरोपी गिरफ्तारी से नहीं बच रहे थे और वे अब मुकदमे का सामना कर रहे हैं, जबकि वर्तमान याचिकाकर्ता लगातार फरार रहा।
हाईकोर्ट ने इसी आधार पर आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत का यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां कोई आरोपी लंबे समय से गिरफ्तारी से बच रहा हो और बाद में गिरफ्तार सह-आरोपियों को मिली राहत के आधार पर खुद भी समान राहत की मांग करे।
अदालत के फैसले से स्पष्ट है कि जमानत में ‘parity’ का सिद्धांत हर आरोपी पर स्वतः लागू नहीं होता। आरोपी की अपनी भूमिका, गिरफ्तारी की स्थिति और जांच में उसका आचरण भी अदालत के लिए महत्वपूर्ण होता है।
कुल मिलाकर, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी से लगातार बच रहे आरोपी को केवल गिरफ्तार सह-आरोपियों को मिली राहत के आधार पर समानता का लाभ नहीं दिया जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने फरार आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
