2 अक्टूबर 2026 डोंबिवली के शास्त्री नगर अस्पताल में डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ से कथित मारपीट के मामले में शिवसेना के नगरसेवक रमेश सुख्र्या म्हात्रे को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने म्हात्रे समेत चार आरोपियों को दी गई जमानत रद्द कर दी है। अदालत ने सभी आरोपियों को 5 अक्टूबर 2026 तक संबंधित ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत क्यों रद्द की?
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के 7 अगस्त के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके जरिए म्हात्रे और तीन अन्य आरोपियों की जमानत बहाल की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने जमानत देते समय मामले से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। इनमें आरोपियों का आपराधिक रिकॉर्ड, म्हात्रे का प्रभाव और कथित घटना का मेडिकल समुदाय तथा समाज पर व्यापक प्रभाव शामिल था।
6 जुलाई को अस्पताल में हुई थी घटना
अदालत के फैसले के मुताबिक, अभियोजन पक्ष का आरोप है कि 6 जुलाई 2026 को रात करीब 8 बजे रमेश म्हात्रे ने तीन अन्य आरोपियों के साथ डोंबिवली के शास्त्री नगर नगर निगम अस्पताल के लेबर वार्ड में ड्यूटी पर मौजूद तीन डॉक्टरों, जिनमें एक महिला डॉक्टर भी शामिल थीं, के साथ कथित तौर पर मारपीट और गाली-गलौज की।
मामले के बाद पुलिस ने कार्रवाई की और यह मामला अदालत तक पहुंचा। घटना के बाद महाराष्ट्र में डॉक्टरों और मेडिकल कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता सामने आई थी।
पहले हाईकोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ दी थी जमानत
बॉम्बे हाईकोर्ट ने 7 अगस्त को म्हात्रे और तीन अन्य आरोपियों को कुछ कड़ी शर्तों के साथ जमानत दी थी। उन्हें मुकदमे की शुरुआत तक महाराष्ट्र से बाहर रहने, सप्ताह में तीन बार गोवा के अंजुना पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करने, पासपोर्ट जमा करने और गवाहों से संपर्क नहीं करने जैसी शर्तें दी गई थीं।
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई को भी तेजी से आगे बढ़ाने के लिए कई निर्देश दिए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मेडिकल स्टाफ की सुरक्षा अहम
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में डॉक्टरों और नर्सों की सुरक्षा तथा स्वास्थ्य व्यवस्था में लोगों के भरोसे के महत्व पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े लोगों पर इस तरह के हमलों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि निर्वाचित पद पर बैठे व्यक्ति से कानून और संस्थाओं के प्रति जिम्मेदारी की अपेक्षा होती है। किसी व्यक्ति को चुनावी जनादेश मिलने से उसे कानून से ऊपर अधिकार नहीं मिल जाता।
चारों आरोपियों को 5 अक्टूबर तक सरेंडर करना होगा
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार रमेश म्हात्रे और अन्य तीन आरोपियों की जमानत रद्द हो चुकी है। सभी को 5 अक्टूबर 2026 तक ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करना होगा।
अगर आरोपी निर्धारित समय तक सरेंडर नहीं करते हैं, तो ट्रायल कोर्ट उनके जमानत बंधपत्र रद्द कर सकती है और उनकी हिरासत सुनिश्चित करने के लिए कानून के मुताबिक आवश्यक कदम उठा सकती है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि परिस्थितियों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव होने पर आरोपी कानून के अनुसार दोबारा जमानत के लिए उचित अदालत का रुख कर सकते हैं।
छह महीने में ट्रायल पूरा करने की कोशिश
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई में तेजी लाने के लिए स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह आदेश की तारीख से छह महीने के भीतर ट्रायल पूरा करने का प्रयास करे।
अदालत ने अभियोजन पक्ष को यह भी कहा कि वह गवाहों की सूची की सावधानी से समीक्षा करे और जहां कानून इसकी अनुमति देता है, वहां ऐसे गवाहों की जांच को कम या समाप्त करने पर विचार करे, जिनकी गवाही मामले के निष्पक्ष फैसले के लिए जरूरी नहीं है।
गवाहों की सुरक्षा पर भी दिए निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के महत्वपूर्ण गवाहों, खासकर डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। ट्रायल कोर्ट को कहा गया है कि अगर किसी गवाह को धमकी, दबाव या डर की आशंका हो तो कानून के तहत आवश्यक सुरक्षा उपाय किए जाएं।
अदालत ने महाराष्ट्र Witness Protection and Security Act, 2017 के प्रावधानों का भी उल्लेख किया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गवाह बिना किसी डर या बाहरी दबाव के अदालत के सामने अपना बयान दे सकें।
म्हात्रे के खिलाफ पहले भी मामले दर्ज होने का जिक्र
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान म्हात्रे के पूर्व आपराधिक मामलों का भी उल्लेख किया। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, वर्तमान मामले सहित उनके खिलाफ 19 मामलों का संदर्भ सामने आया। म्हात्रे की ओर से पेश वकील ने कहा कि इनमें से 18 मामलों में उन्हें बरी किया जा चुका है। अदालत ने संबंधित मामलों के रिकॉर्ड मंगाने की बात भी कही थी।
