4 सितंबर 2026 हरियाणा के गुरुग्राम में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और पानी की बढ़ती मांग के बीच भूजल संकट गंभीर होता जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, जिले में भूजल का दोहन उसकी प्राकृतिक रूप से दोबारा भरने की क्षमता की तुलना में करीब दोगुना हो चुका है। गुरुग्राम में भूजल निकासी का स्तर जिले की शुद्ध वार्षिक भूजल उपलब्धता का 194.6 प्रतिशत बताया गया है। यह आंकड़ा जिले में लगातार बढ़ते जल दबाव की ओर संकेत करता है।
प्राकृतिक रिचार्ज से लगभग दोगुना भूजल दोहन
गुरुग्राम में भूजल दोहन की मौजूदा दर 194.6 प्रतिशत है। यानी जमीन के नीचे जितना पानी प्राकृतिक प्रक्रियाओं के जरिए दोबारा पहुंच रहा है, उससे काफी अधिक मात्रा में भूजल निकाला जा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, यह स्थिति वर्ष 2009 के मुकाबले कुछ बेहतर जरूर हुई है। उस समय भूजल दोहन की दर करीब 232 प्रतिशत दर्ज की गई थी। हालांकि, मौजूदा स्तर अभी भी चिंताजनक बना हुआ है।
हरियाणा और देश के औसत से भी ज्यादा
गुरुग्राम में भूजल दोहन का स्तर हरियाणा और राष्ट्रीय औसत से भी काफी अधिक है। रिपोर्ट के मुताबिक, हरियाणा में भूजल दोहन की दर 136.75 प्रतिशत, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह करीब 60.63 प्रतिशत है।
इस तुलना से पता चलता है कि गुरुग्राम में भूजल पर दबाव राज्य और देश के औसत से कहीं अधिक है। तेजी से बढ़ती आबादी, निर्माण गतिविधियों और पानी की मांग ने इस समस्या को और गंभीर बनाया है।
2008 से डार्क जोन में गुरुग्राम
भूजल के अत्यधिक दोहन को देखते हुए गुरुग्राम को 2008 से ‘डार्क जोन’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इसके अलावा सोहना, पटौदी और फर्रुखनगर के कई ब्लॉकों को भी भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण रेड जोन में रखा गया है।
डार्क जोन की स्थिति इस बात का संकेत देती है कि क्षेत्र में भूजल का इस्तेमाल प्राकृतिक रिचार्ज की क्षमता से अधिक हो रहा है और भविष्य में जल उपलब्धता को लेकर गंभीर चुनौती पैदा हो सकती है।
जमीन के इस्तेमाल में बदलाव भी बड़ी वजह
गुरुग्राम में भूजल संकट को केवल बढ़ती आबादी से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। जिले में जमीन के इस्तेमाल के तरीके में भी बड़े बदलाव हुए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 1,25,400 हेक्टेयर में से करीब 67.78 प्रतिशत क्षेत्र कृषि के तहत आता है। वहीं लगभग 18 प्रतिशत क्षेत्र में निर्माण और विकसित क्षेत्र हैं।
इसके साथ ही जिले में वन क्षेत्र केवल करीब 1.90 प्रतिशत है, जबकि जल निकायों का हिस्सा महज 0.16 प्रतिशत बताया गया है। कम जल निकाय और तेजी से बढ़ता निर्माण बारिश के पानी को जमीन में पहुंचने से रोक सकते हैं।
तालाब और पारंपरिक जल स्रोत हुए कम
गुरुग्राम में पारंपरिक जल निकासी और भूजल रिचार्ज व्यवस्था में भी समय के साथ बदलाव आया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि जिले में कभी बड़ी संख्या में तालाब, जोहड़ और बावड़ियां मौजूद थीं, जो बारिश के पानी को रोकने और जमीन के अंदर पहुंचाने में मदद करती थीं।
बताया गया है कि गुरुग्राम में जल निकायों की संख्या 1990 के दशक के मध्य में 600 से अधिक थी, जो अब घटकर 100 से कुछ अधिक रह गई है।
जल निकायों में यह गिरावट भूजल रिचार्ज के साथ-साथ बारिश के पानी को संभालने की क्षमता को भी प्रभावित कर सकती है।
प्राकृतिक ड्रेनेज सिस्टम पर भी दबाव
गुरुग्राम की पारंपरिक जल निकासी व्यवस्था में साबिक नदी प्रणाली, अरावली की मौसमी धाराएं, बादशाहपुर ड्रेन और तालाब-जोहड़ जैसे जल स्रोत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इन प्राकृतिक और पारंपरिक प्रणालियों के कमजोर होने से बारिश का पानी तेजी से बहकर बाहर निकल जाता है और भूजल रिचार्ज के लिए पर्याप्त मात्रा में जमीन के अंदर नहीं पहुंच पाता।
इसका असर एक तरफ भूजल स्तर पर पड़ता है तो दूसरी तरफ भारी बारिश के दौरान जलभराव का खतरा भी बढ़ सकता है।
बारिश के पानी को जमीन में पहुंचाने पर जोर
भूजल संकट से निपटने के लिए रिपोर्ट में कई उपायों की जरूरत बताई गई है। इनमें ऐसे फुटपाथ और सतह विकसित करना शामिल है, जिनसे बारिश का पानी जमीन में आसानी से जा सके।
इसके अलावा भवन निर्माण नियमों के तहत रेनवॉटर हार्वेस्टिंग को प्रभावी तरीके से लागू करने और पुराने तालाबों तथा वेटलैंड्स को पुनर्जीवित करने की जरूरत पर जोर दिया गया है।
ऐसे उपाय बारिश के पानी को केवल बह जाने से रोकने के साथ-साथ भूजल स्तर को बढ़ाने में भी मदद कर सकते हैं।
गुरुग्राम की तेजी से बढ़ती आबादी भी चुनौती
गुरुग्राम पिछले कुछ वर्षों में देश के प्रमुख कॉरपोरेट और रियल एस्टेट केंद्रों में तेजी से विकसित हुआ है। नए आवासीय क्षेत्रों, व्यावसायिक परिसरों और अन्य निर्माण गतिविधियों के बढ़ने के साथ पानी की मांग भी बढ़ी है।
शहरीकरण के कारण खुले और प्राकृतिक क्षेत्रों में कमी आने से बारिश के पानी का जमीन में रिसाव प्रभावित होता है। ऐसे में एक ओर पानी की मांग बढ़ती है और दूसरी ओर प्राकृतिक रिचार्ज की क्षमता पर दबाव बढ़ता है।
सांसद ने जल संकट पर जताई चिंता
गुरुग्राम के सांसद राव इंद्रजीत सिंह ने बुधवार को अधिकारियों के साथ बैठक में जिले की जल और नागरिक सुविधाओं से जुड़ी समस्याओं पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि गुरुग्राम की समस्याओं पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।
उन्होंने शहर के बुनियादी ढांचे, पानी की उपलब्धता और नगर निगम के बजट से जुड़े मुद्दों पर भी ध्यान देने की बात कही।
आने वाले समय में बढ़ सकती है चुनौती
विशेषज्ञों और रिपोर्ट में सुझाए गए उपायों के अनुसार, गुरुग्राम में भूजल संकट को कम करने के लिए केवल नए जल स्रोत तलाशना पर्याप्त नहीं होगा। भूजल दोहन को नियंत्रित करने के साथ-साथ रिचार्ज की क्षमता बढ़ाना भी जरूरी है।
तालाबों और जल निकायों का संरक्षण, बारिश के पानी का संग्रह, जमीन में पानी पहुंचाने वाली सतहों को बढ़ावा देना और पानी के जिम्मेदार इस्तेमाल को लेकर सख्ती इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
