22 सितंबर 2026: हरियाणा के सिरसा में 98 साल की शांति बाई ने साक्षरता परीक्षा देकर यह संदेश दिया कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। उम्र के इस पड़ाव पर भी शिक्षा हासिल करने की उनकी इच्छा और परीक्षा देने का उत्साह लोगों के लिए प्रेरणा का विषय बना हुआ है।
98 साल की उम्र में परीक्षा देने पहुंचीं
शांति बाई ने सिरसा में आयोजित साक्षरता परीक्षा में हिस्सा लिया। आमतौर पर जहां उम्र बढ़ने के साथ पढ़ाई-लिखाई से लोगों का जुड़ाव कम हो जाता है, वहीं शांति बाई ने इस धारणा को पीछे छोड़ते हुए परीक्षा देने का फैसला किया।
उनका परीक्षा में शामिल होना इस बात को दर्शाता है कि शिक्षा हासिल करने की इच्छा उम्र की सीमा से बंधी नहीं होती। उन्होंने सीखने के प्रति अपनी रुचि को बनाए रखते हुए साक्षरता की दिशा में कदम आगे बढ़ाया।
पढ़ाई के लिए नहीं मानी उम्र की सीमा
शांति बाई की उम्र 98 वर्ष है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने पढ़ने और लिखने की कोशिश जारी रखी। साक्षरता परीक्षा में उनकी भागीदारी ने आसपास मौजूद लोगों का ध्यान भी आकर्षित किया।
उनकी कहानी खास तौर पर उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है, जो किसी भी कारण से कम उम्र में शिक्षा हासिल नहीं कर पाए। शांति बाई का उदाहरण बताता है कि अगर सीखने की इच्छा हो तो जीवन के किसी भी पड़ाव पर नई शुरुआत की जा सकती है।
साक्षरता अभियान का उद्देश्य
साक्षरता कार्यक्रमों का उद्देश्य उन लोगों को पढ़ने, लिखने और बुनियादी जानकारी हासिल करने का अवसर देना है, जो औपचारिक शिक्षा से वंचित रह गए। ऐसे अभियानों के माध्यम से वयस्कों को भी शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया जाता है।
बुनियादी साक्षरता किसी व्यक्ति को रोजमर्रा के कई कामों में आत्मनिर्भर बनने में मदद कर सकती है। अपना नाम पढ़ना-लिखना, जरूरी जानकारी समझना और सामान्य दस्तावेजों को पढ़ पाना भी इसके महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
शांति बाई बनीं प्रेरणा
98 साल की उम्र में परीक्षा देना शांति बाई के लिए केवल एक परीक्षा में शामिल होना नहीं, बल्कि सीखने के प्रति उनके उत्साह का उदाहरण है। उनकी भागीदारी यह संदेश देती है कि शिक्षा के लिए उम्र कभी बाधा नहीं बननी चाहिए।
उनकी कहानी यह भी दिखाती है कि परिवार और समाज का सहयोग मिलने पर बुजुर्ग भी नई चीजें सीखने और अपने अधूरे सपनों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
बुजुर्गों के लिए शिक्षा का महत्व
बुजुर्गों के बीच साक्षरता बढ़ाने से उन्हें रोजमर्रा के जीवन में अधिक आत्मनिर्भर बनने में मदद मिल सकती है। बैंकिंग, स्वास्थ्य सेवाओं, सरकारी योजनाओं और जरूरी दस्तावेजों से जुड़ी जानकारी समझने में भी बुनियादी शिक्षा उपयोगी होती है।
इसी वजह से वयस्क और बुजुर्ग साक्षरता कार्यक्रमों को केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इन्हें सामाजिक और व्यक्तिगत आत्मनिर्भरता से भी जोड़कर देखा जाता है।
उम्र नहीं, सीखने की इच्छा मायने रखती है
शांति बाई की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनका जज्बा है। 98 साल की उम्र में साक्षरता परीक्षा देना अपने आप में यह संदेश देता है कि सीखने की कोई अंतिम उम्र नहीं होती।
जब कोई व्यक्ति जीवन के इतने लंबे सफर के बाद भी नई चीज सीखने के लिए तैयार रहता है, तो वह आने वाली पीढ़ियों को भी शिक्षा के महत्व का संदेश देता है।
