4 नवंबर 2026 : पंजाब के अमृतसर जिले का संघना गांव अपनी ऐतिहासिक और सिख विरासत के लिए जाना जाता है। गांव के लोग आज भी शहीद बाबा बालाका सिंह की बहादुरी और बलिदान को याद करते हैं। उनकी स्मृति को संजोने के लिए गांव में गुरुद्वारा बनाया गया है, प्रवेश द्वार पर उनके नाम का गेट स्थापित किया गया है और उनकी तस्वीर भी प्रमुख स्थान पर लगाई गई है। हर साल अक्टूबर के मध्य में उनके सम्मान में मेला आयोजित किया जाता है।
मुगल सेना के खिलाफ संघर्ष में हुए थे शहीद
स्थानीय इतिहास से जुड़ी जानकारी के अनुसार, बाबा बालाका सिंह 18वीं सदी में मुगल शासन के दौरान सिख योद्धाओं के साथ संघर्ष में शामिल थे। उस समय पंजाब के तत्कालीन गवर्नर जकारिया खान के शासन में सिखों के खिलाफ सैन्य अभियान चलाए जा रहे थे।
दिसंबर 1726 में बाबा तारा सिंह के नेतृत्व वाले निहंग सिखों और मुगल सेना के बीच एक भीषण संघर्ष हुआ था। बताया जाता है कि इस लड़ाई में बाबा बालाका सिंह सबसे पहले आगे बढ़े और दुश्मन सैनिकों का मुकाबला किया। इसी दौरान उनके सीने में तीर लग गया, जिससे वह शहीद हो गए।
इस संघर्ष में बाबा तारा सिंह और उनके साथियों ने भी बहादुरी से मुकाबला किया। बाबा बालाका सिंह का बलिदान सिख योद्धाओं के संघर्ष के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
गांव में लाकर सुरक्षित रखी गईं अस्थियां
बाबा बालाका सिंह की शहादत की खबर जब संघना गांव पहुंची तो गांव की संगत उनकी अस्थियां वापस लेकर आई। उन्हें उस स्थान पर सुरक्षित रखा गया, जहां बाद में गुरुद्वारा स्थापित किया गया। आज यह गुरुद्वारा बाबा बालाका सिंह की स्मृति और गांव की ऐतिहासिक पहचान का प्रमुख केंद्र है।
गांव के प्रवेश द्वार पर उनके सम्मान में बनाया गया गेट भी आने-जाने वाले लोगों को उनके बलिदान की याद दिलाता है। गांव में उनकी बड़ी तस्वीर लगाई गई है, ताकि नई पीढ़ी भी अपने इतिहास और वीर योद्धाओं के योगदान से परिचित हो सके।
हर साल आयोजित होता है यादगारी मेला
बाबा बालाका सिंह की स्मृति में हर साल अक्टूबर के मध्य में मेला आयोजित किया जाता है। इस दौरान संगत और गांव के लोग एकत्र होकर उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। धार्मिक और सामुदायिक कार्यक्रमों के माध्यम से उनकी विरासत को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाता है।
गांव में बाबा बालाका सिंह से जुड़ी एक पंजाबी कहावत भी प्रचलित है, जिसमें उनके संघना गांव और सेखों वंश से संबंध के साथ युद्ध के मैदान में उनकी बहादुरी का उल्लेख मिलता है। यह लोक परंपरा बताती है कि उनकी पहचान केवल ऐतिहासिक घटनाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि गांव की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन चुकी है।
संघना गांव का सिख इतिहास से गहरा संबंध
संघना गांव का इतिहास केवल बाबा बालाका सिंह तक सीमित नहीं है। गांव के बाबा नंद सिंह ने संघनिया मिसल की स्थापना की थी, जो बाद में रामगढ़िया मिसल के नाम से प्रसिद्ध हुई। गांव के अन्य लोगों ने भी सिख धार्मिक संस्थाओं और सेवा परंपरा में योगदान दिया।
इस तरह संघना गांव धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक स्मृतियों और सिख योद्धाओं की विरासत को एक साथ संजोए हुए है। गुरुद्वारा, यादगारी गेट और वार्षिक मेला इस बात का प्रमाण हैं कि गांव के लोग अपने इतिहास को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।
