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जम्मू-कश्मीर में पंजाबी भाषा को आधिकारिक दर्जा देने की मांग तेज, सिख संगठनों ने केंद्र और सरकार से की अपील

13 अक्टूबर 2026: जम्मू-कश्मीर में पंजाबी भाषा को आधिकारिक दर्जा दिलाने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। अमृतसर स्थित सिख धार्मिक और शैक्षणिक संस्था चीफ खालसा दीवान (CKD) ने केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन से पंजाबी को आधिकारिक भाषाओं की सूची में शामिल करने तथा स्कूलों में इसकी पढ़ाई दोबारा शुरू कराने की अपील की है। यह मांग ऐसे समय में उठी है, जब जम्मू पंजाबी मोर्चा के नेतृत्व में सिख समुदाय के सदस्य भी भाषा की मान्यता और शिक्षा में इसकी वापसी के लिए अभियान चला रहे हैं।

चीफ खालसा दीवान ने उठाई मांग

चीफ खालसा दीवान के अध्यक्ष डॉ. इंदरबीर सिंह निज्जर ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में पंजाबी बोलने वाले लोगों की बड़ी आबादी है और इस भाषा का क्षेत्र के इतिहास, संस्कृति तथा सामाजिक जीवन से गहरा संबंध रहा है।

उन्होंने कहा कि पंजाबी को आधिकारिक पहचान देना केवल भाषा का सवाल नहीं, बल्कि इससे जुड़े लोगों की सांस्कृतिक विरासत और भाषाई अधिकारों की रक्षा का भी विषय है। संस्था ने इस मांग को आगे बढ़ाने के लिए जल्द ही जम्मू में एक प्रतिनिधिमंडल भेजने की बात भी कही है। यह प्रतिनिधिमंडल जम्मू पंजाबी मोर्चा के नेताओं से मुलाकात कर आगे की रणनीति पर चर्चा करेगा।

स्कूलों में पंजाबी की पढ़ाई दोबारा शुरू कराने पर जोर

सिख संगठनों की मांग है कि पंजाबी को जम्मू-कश्मीर के स्कूलों के पाठ्यक्रम में दोबारा शामिल किया जाए। इसके साथ ही पंजाबी भाषा के शिक्षकों के खाली पद भरे जाएं और नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा सीखने के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध कराए जाएं।

संगठनों का कहना है कि भाषा की शिक्षा के माध्यम से बच्चों को अपनी सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत से जोड़े रखना जरूरी है। पंजाबी भाषा का संबंध सिख समुदाय की धार्मिक और साहित्यिक परंपराओं से भी है, इसलिए इसकी पढ़ाई को फिर से बढ़ावा देने की मांग की जा रही है।

जम्मू पंजाबी मोर्चा भी चला रहा अभियान

जम्मू पंजाबी मोर्चा के बैनर तले सिख समुदाय के सदस्यों ने हाल ही में जम्मू में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर पंजाबी को आधिकारिक भाषा का दर्जा देने और स्कूलों में इसकी पढ़ाई बहाल करने की मांग उठाई थी।

प्रदर्शनकारियों ने जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल प्रशासन और सरकार से इस मुद्दे पर कार्रवाई करने की अपील की। जिला गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, जम्मू के महासचिव सुरजन सिंह सहित समुदाय के प्रतिनिधियों ने कहा कि पंजाबी लंबे समय से क्षेत्र की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि मांग पर उचित तरीके से विचार नहीं किया गया, तो आंदोलन और धरने जारी रखे जा सकते हैं।

2020 के कानून में पंजाबी को नहीं मिली आधिकारिक भाषा की सूची में जगह

जम्मू-कश्मीर में आधिकारिक भाषाओं को लेकर वर्ष 2020 में कानून बनाया गया था। जम्मू-कश्मीर आधिकारिक भाषा अधिनियम, 2020 के तहत कश्मीरी, डोगरी, उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी को आधिकारिक भाषाओं के रूप में मान्यता दी गई। पंजाबी को इस सूची में शामिल नहीं किया गया।

हालांकि, इसी कानून की धारा 4 में पंजाबी, गोजरी और पहाड़ी जैसी क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने और उनके विकास के लिए कदम उठाने का प्रावधान है। पंजाबी भाषा के समर्थक अब चाहते हैं कि इसे केवल क्षेत्रीय भाषा के रूप में प्रोत्साहन देने तक सीमित न रखा जाए, बल्कि आधिकारिक दर्जा और शिक्षा में भी उचित स्थान दिया जाए।

जम्मू-कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी है पंजाबी

पंजाब और जम्मू क्षेत्र के बीच ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध लंबे समय से रहे हैं। जम्मू और आसपास के क्षेत्रों में पंजाबी बोलने वाले समुदायों की मौजूदगी के कारण यह भाषा स्थानीय जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।

भाषा समर्थकों का मानना है कि पंजाबी को शिक्षा और प्रशासन में अधिक स्थान मिलने से नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा, साहित्य और परंपराओं से जुड़ी रह सकेगी। उनका कहना है कि भाषाओं का संरक्षण केवल उनके इस्तेमाल तक सीमित नहीं होता, बल्कि उन्हें पढ़ाने, लिखने और सार्वजनिक जीवन में इस्तेमाल करने के अवसर देना भी जरूरी है।

सरकार के सामने अब क्या है चुनौती?

पंजाबी को आधिकारिक भाषा का दर्जा देने की मांग के बीच भाषा की शिक्षा को मजबूत करना और पंजाबी शिक्षकों के पदों को भरना भी अहम मुद्दे बने हुए हैं। चीफ खालसा दीवान और जम्मू पंजाबी मोर्चा जैसे संगठन चाहते हैं कि सरकार इस मामले पर स्पष्ट नीति बनाए और लंबे समय से उठ रही मांग पर ठोस कदम उठाए।

फिलहाल पंजाबी को आधिकारिक भाषाओं की सूची में शामिल करने का निर्णय घोषित नहीं हुआ है। ऐसे में आने वाले समय में सरकार की प्रतिक्रिया और भाषा को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदम महत्वपूर्ण होंगे।

निष्कर्ष: जम्मू-कश्मीर में पंजाबी भाषा को आधिकारिक दर्जा देने की मांग को चीफ खालसा दीवान और सिख संगठनों का समर्थन मिला है। संगठनों ने आधिकारिक मान्यता के साथ-साथ स्कूलों में पंजाबी की पढ़ाई बहाल करने, शिक्षकों के खाली पद भरने और भाषा के संरक्षण के लिए प्रभावी नीति बनाने की अपील की है।

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