14 अप्रैल 2026 : दिल्ली की राजनीति और न्यायिक हलकों में चर्चा के बीच अरविंद केजरीवाल ने उच्च न्यायालय में जज के मामले से अलग होने (recusal) को लेकर अपना पक्ष रखा है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय किसी पक्षपात (bias) के कारण नहीं, बल्कि ‘धारणा’ यानी perception के आधार पर लिया गया है।
यह मामला उस समय चर्चा में आया जब एक जज ने खुद को एक मामले की सुनवाई से अलग कर लिया। आमतौर पर जज का recusal तब होता है जब उन्हें लगता है कि किसी कारणवश उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठ सकता है या ऐसा प्रतीत हो सकता है।
केजरीवाल ने अदालत में कहा कि न्याय केवल निष्पक्ष होना ही नहीं चाहिए, बल्कि ऐसा दिखना भी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि किसी मामले में पक्षपात की कोई वास्तविक स्थिति नहीं है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है, तो भी उस स्थिति को गंभीरता से लेना जरूरी है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायपालिका में ‘perception of bias’ यानी पक्षपात की धारणा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी वास्तविक निष्पक्षता। यदि किसी पक्ष को यह लगता है कि सुनवाई निष्पक्ष नहीं होगी, तो न्याय प्रणाली पर भरोसा प्रभावित हो सकता है।
इस मुद्दे ने न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर एक व्यापक बहस को जन्म दिया है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि जज का खुद को अलग करना एक जिम्मेदार कदम हो सकता है, जिससे न्याय व्यवस्था पर लोगों का विश्वास बना रहता है।
हालांकि, इस तरह के मामलों में अलग-अलग पक्षों की अलग राय भी सामने आती है। कुछ लोग इसे न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा मानते हैं, जबकि कुछ इसे अनावश्यक विवाद का कारण भी बताते हैं।
फिलहाल यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है और आने वाले समय में इस पर आगे की सुनवाई होगी।
कुल मिलाकर केजरीवाल के इस बयान ने न्यायपालिका में ‘धारणा बनाम वास्तविकता’ के मुद्दे को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
