14 सितंबर, 2026 : पंजाब के कपूरथला जिले में एक किसान ने धान की खेती में रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक अलग पहल की है। सुल्तानपुर लोधी के महाबलीपुर गांव के किसान सुखजिंदर सिंह लंबे समय से अपने खेतों में टिकाऊ खेती के तरीकों को अपनाते आ रहे हैं। करीब 12 एकड़ जमीन पर खेती करने वाले सुखजिंदर सिंह ने धान की फसल में यूरिया का इस्तेमाल बंद कर डेयरी स्लरी को अपनाया है।
खेती में पारंपरिक तरीके से अलग प्रयोग
पंजाब में धान की खेती के दौरान किसान आमतौर पर फसल की बढ़वार और पोषक तत्वों की जरूरत पूरी करने के लिए रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में डेयरी से निकलने वाली स्लरी को खेतों में इस्तेमाल करना जैविक और टिकाऊ कृषि की दिशा में एक विकल्प माना जा रहा है।
सुखजिंदर सिंह ने अपने खेतों में इसी तरह के प्रयोग को अपनाया है। उनका उद्देश्य डेयरी से निकलने वाले अपशिष्ट को उपयोगी बनाना और खेती में बाहरी रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम करना है।
यूरिया की जगह डेयरी स्लरी का इस्तेमाल
किसान ने धान के खेतों में यूरिया के स्थान पर डेयरी स्लरी का इस्तेमाल शुरू किया है। डेयरी स्लरी पशुओं से जुड़े जैविक अपशिष्ट और तरल पदार्थों से प्राप्त सामग्री होती है, जिसे उचित तरीके से प्रबंधित करके खेतों में जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
इस तरह डेयरी से निकलने वाले अपशिष्ट का दोबारा कृषि में उपयोग संभव होता है। इससे खेती और पशुपालन के बीच एक ऐसा चक्र बन सकता है, जिसमें एक गतिविधि से निकलने वाला जैविक पदार्थ दूसरी गतिविधि में काम आता है।
करीब 12 एकड़ में कर रहे हैं खेती
सुखजिंदर सिंह करीब 12 एकड़ जमीन पर खेती करते हैं। उनके लिए टिकाऊ खेती केवल एक विचार नहीं बल्कि लंबे समय से अपनाई जा रही कृषि पद्धति है। खेत में डेयरी स्लरी का इस्तेमाल इसी सोच का हिस्सा है।
धान की खेती में यूरिया का इस्तेमाल कम करने की कोशिश ऐसे समय में महत्वपूर्ण मानी जा सकती है, जब कृषि में लागत घटाने, मिट्टी की सेहत बनाए रखने और उपलब्ध जैविक संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने पर जोर दिया जा रहा है।
डेयरी और खेती को जोड़ने का प्रयास
डेयरी स्लरी के इस्तेमाल से किसान खेती और पशुपालन को एक-दूसरे से जोड़ सकते हैं। पशुओं से मिलने वाले जैविक संसाधनों को खेतों में वापस पहुंचाने से कृषि प्रणाली में संसाधनों का पुनर्चक्रण संभव होता है।
इस तरह का मॉडल खासतौर पर उन किसानों के लिए उपयोगी हो सकता है, जिनके पास खेती के साथ डेयरी भी है। हालांकि, स्लरी का इस्तेमाल वैज्ञानिक तरीके और उचित मात्रा में करना जरूरी है, ताकि फसल और मिट्टी पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
टिकाऊ खेती की ओर बढ़ता कदम
कपूरथला के किसान का यह प्रयोग टिकाऊ कृषि के उन तरीकों की ओर ध्यान आकर्षित करता है, जिनमें स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल किया जाता है। खेती में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करना, जैविक सामग्री का पुन: उपयोग और मिट्टी की गुणवत्ता को बनाए रखना लंबे समय के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
ऐसे प्रयोग किसानों को यह सोचने का अवसर भी देते हैं कि खेती की लागत और संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध विकल्पों का किस तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।
दूसरे किसानों के लिए बन सकता है उदाहरण
सुखजिंदर सिंह का प्रयोग दूसरे किसानों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकता है। खासकर ऐसे किसान, जो खेती के साथ पशुपालन करते हैं, वे डेयरी से निकलने वाली जैविक सामग्री को खेतों में उपयोग करने की संभावनाओं पर विचार कर सकते हैं।
हालांकि किसी भी वैकल्पिक उर्वरक या जैविक सामग्री को बड़े स्तर पर अपनाने से पहले कृषि विशेषज्ञों की सलाह, मिट्टी की जांच और फसल की जरूरत के अनुसार सही मात्रा निर्धारित करना जरूरी है।
