24 सितंबर 2026: गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (GNDU) में कैंपस की रोजमर्रा की व्यस्तता के बीच एक सुरमयी शाम ने छात्रों को भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा से जोड़ दिया। हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक प्रो. सुभेंदु घोष की प्रस्तुति के दौरान परिसर का माहौल संगीत की मधुर धुनों से भर गया।
प्रो. घोष ने अपनी प्रस्तुति के माध्यम से छात्रों को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की बारीकियों और विभिन्न घरानों की परंपरा से परिचित कराया। उनकी प्रस्तुति में संगीत की तकनीकी समझ के साथ-साथ उसकी भावनात्मक अभिव्यक्ति भी देखने को मिली।
प्रो. सुभेंदु घोष ने दी शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति
प्रो. सुभेंदु घोष हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रसिद्ध कलाकार हैं और रामपुर घराने से जुड़े हुए हैं। वह रमेश नाडकर्णी के शिष्य रहे हैं। नाडकर्णी ने पद्मश्री उस्ताद हाफिज अहमद खान और भिंडी बाजार घराने के अमन अली से संगीत की शिक्षा प्राप्त की थी।
संगीत के साथ प्रो. घोष का अकादमिक क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में बायोफिजिक्स पढ़ाया है। विज्ञान और संगीत के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े उनके अनुभव ने उनकी व्यक्तिगत यात्रा को खास बनाया है।
छात्रों को बताया भारतीय संगीत का इतिहास
कार्यक्रम के दौरान प्रो. घोष ने भारतीय संगीत की परंपरा और उसके विकास पर भी चर्चा की। उन्होंने संगीत को भारत की धर्मनिरपेक्ष काव्य परंपरा से जोड़ते हुए 13वीं शताब्दी से लेकर आधुनिक दौर तक के कई प्रमुख रचनाकारों और कवियों का उल्लेख किया।
उन्होंने अमीर खुसरो, कबीर, तानसेन, बुल्ले शाह, लालन फकीर, रवींद्रनाथ टैगोर और फैज जैसे नामों का संदर्भ देते हुए बताया कि भारतीय संगीत और काव्य की परंपरा कितनी व्यापक और विविध रही है।
प्रो. घोष ने छात्रों से कहा कि हिंदुस्तानी राग और पारंपरिक लोक संगीत भारत के संगीत इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। संगीत सीखने के लिए रचनात्मकता के साथ सटीकता, अनुशासन और जिज्ञासा की भी जरूरत होती है।
रामपुर और भिंडी बाजार घराने की विशेषताओं पर चर्चा
कार्यक्रम में प्रो. घोष ने रामपुर और भिंडी बाजार घरानों की विशेषताओं के बारे में भी विस्तार से बताया। उन्होंने समझाया कि अलग-अलग घरानों ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शैली और प्रस्तुति को किस तरह प्रभावित किया है।
इसके बाद उन्होंने कई रागों की प्रस्तुति दी। इनमें अहीर भैरव, तोड़ी, हंसध्वनि, यमन और किरवानी शामिल रहे। प्रत्येक राग को अलग भाव और शैली के साथ प्रस्तुत किया गया।
बंदिशों और तरानों के माध्यम से उन्होंने छात्रों को यह समझाने की कोशिश की कि राग केवल सुरों का एक निश्चित क्रम नहीं होता, बल्कि कलाकार की आवाज, व्याख्या और कल्पनाशीलता से उसे अलग व्यक्तित्व मिलता है।
हारमोनियम, तबला और तानपुरे ने बढ़ाई प्रस्तुति की खूबसूरती
प्रो. सुभेंदु घोष के साथ संगीत प्रस्तुति में GNDU के विभाग से जुड़े कलाकारों ने भी सहयोग किया। विभाग के फैकल्टी सदस्य हरसिमरन सिंह ने हारमोनियम पर संगत की, जबकि गुनवीर सिंह ने तबले पर ताल का साथ दिया।
वहीं विभाग के छात्र योगेश शर्मा ने तानपुरा संभाला। तानपुरे की लगातार बनी रहने वाली ध्वनि ने पूरी प्रस्तुति के दौरान संगीत को आधार प्रदान किया।
हारमोनियम और तबले की संगत के साथ जब प्रो. घोष ने अलग-अलग राग प्रस्तुत किए तो कार्यक्रम का माहौल और भी प्रभावशाली हो गया।
छात्रों के लिए सीखने का भी अवसर
इस कार्यक्रम की खासियत केवल संगीत सुनना नहीं थी, बल्कि छात्रों को भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा को करीब से समझने का अवसर भी मिला। कलाकार को सामने सुनने और संगीत की प्रस्तुति को प्रत्यक्ष देखने से छात्रों को राग, बंदिश और ताल जैसी अवधारणाओं को समझने का अनुभव मिला।
प्रो. घोष ने गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व पर भी बात की। भारतीय शास्त्रीय संगीत में सीखने की प्रक्रिया लंबे समय तक सुनने, दोहराने और अभ्यास करने से जुड़ी रही है। उनके अनुसार, एक कलाकार और शिक्षक के रूप में वह इन दोनों पहलुओं को एक साथ अनुभव करते हैं।
कैंपस की भागदौड़ के बीच संगीत ने दिया सुकून
GNDU में आयोजित यह संगीत संध्या छात्रों के लिए पढ़ाई और कैंपस की व्यस्त दिनचर्या के बीच एक अलग अनुभव लेकर आई। शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति ने छात्रों को भारतीय सांस्कृतिक और संगीत विरासत से जुड़ने का अवसर दिया।
ऐसे कार्यक्रम विश्वविद्यालय के शैक्षणिक वातावरण को केवल कक्षा और पाठ्यक्रम तक सीमित रखने के बजाय कला, साहित्य और संस्कृति से भी जोड़ते हैं। इस शाम में छात्रों ने न केवल संगीत का आनंद लिया बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपराओं को समझने का भी अवसर पाया।
