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चंडीगढ़ के किसानों ने हरियाणा मॉडल पर लैंड पूलिंग पॉलिसी लागू करने की मांग की, जमीन अधिग्रहण और किसानों के मुआवजे को लेकर उठाए सवाल

5 नवंबर 2026 :   चंडीगढ़ में जमीन के मालिकाना हक और विकास में किसानों की हिस्सेदारी को लेकर एक बार फिर मांग तेज हो गई है। शहर के 22 गांवों के किसानों ने हरियाणा सरकार की तर्ज पर चंडीगढ़ में भी लैंड पूलिंग पॉलिसी लागू करने की मांग उठाई है। किसानों का कहना है कि चंडीगढ़ में तेजी से शहरी विकास हो रहा है, लेकिन जिन किसानों की जमीन इस विकास का आधार है, उन्हें इसका उचित लाभ नहीं मिल रहा है। ऐसे में प्रशासन को जल्द से जल्द किसानों के हित में स्पष्ट और पारदर्शी नीति बनानी चाहिए।

चंडीगढ़ पेंडू विकास मंच के अध्यक्ष और मनोनीत पार्षद सतिंदर पाल सिंह सिद्धू ने इस संबंध में अपनी मांग रखते हुए कहा कि शहर के 22 गांवों के कृषि भूमि मालिक लंबे समय से लैंड पूलिंग पॉलिसी का इंतजार कर रहे हैं। इन गांवों को नगर निगम के दायरे में शामिल किए जाने के बावजूद किसानों को उनकी जमीन के नियोजित विकास में भागीदार बनाने के लिए कोई स्पष्ट नीति नहीं बनाई गई है।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब हरियाणा में जमीन मालिकों को विकास का हिस्सा बनाया जा रहा है, तो चंडीगढ़ के किसानों को समान अधिकार और सुविधाएं क्यों नहीं मिलनी चाहिए? किसानों का मानना है कि प्रशासन की ओर से इस मुद्दे पर स्पष्ट फैसला नहीं लिए जाने के कारण गांवों के लोगों में निराशा बढ़ रही है।

हरियाणा की नई लैंड पूलिंग पॉलिसी से बढ़ी उम्मीदें

चंडीगढ़ के किसानों की मांग उस समय और तेज हो गई है, जब हरियाणा सरकार ने 3 नवंबर 2026 को नई लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 को मंजूरी दी। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में इस नीति को मंजूरी दी गई। इसके तहत जमीन मालिकों को विकास परियोजना के कुल बिक्री योग्य क्षेत्र का 50 प्रतिशत हिस्सा विकसित भूखंडों के रूप में दिया जाएगा, जबकि बाकी 50 प्रतिशत हिस्सा विकास एजेंसी के पास रहेगा।

नई नीति के तहत जमीन मालिकों को केवल नकद मुआवजे पर निर्भर रहने के बजाय विकसित जमीन में हिस्सेदारी मिलेगी। इसके अलावा किसानों को चार साल तक प्रति एकड़ सालाना एक लाख रुपये की अंतरिम आर्थिक सहायता देने का प्रावधान भी किया गया है।

हरियाणा सरकार ने परियोजनाओं में बुनियादी सुविधाओं का विकास पूरा करने की समयसीमा भी पांच साल से घटाकर चार साल कर दी है। यदि तय समय में बुनियादी सुविधाओं का विकास पूरा नहीं होता है, तो जमीन वापस जमीन मालिकों को लौटाने का प्रावधान किया गया है।

इसी मॉडल को देखते हुए चंडीगढ़ के किसान भी चाहते हैं कि प्रशासन उनके लिए ऐसी ही नीति तैयार करे, ताकि उन्हें अपनी जमीन के बदले विकास में उचित हिस्सेदारी मिल सके।

22 गांवों के किसानों को विकास में भागीदारी चाहिए

चंडीगढ़ पेंडू विकास मंच का कहना है कि शहर के आसपास तेजी से आवासीय, व्यावसायिक और संस्थागत विकास हो रहा है। इस विकास के लिए कृषि भूमि का इस्तेमाल भी किया जाता है, लेकिन मूल जमीन मालिकों को विकास से मिलने वाले आर्थिक लाभ में पर्याप्त भागीदारी नहीं मिलती।

किसानों की मांग है कि उन्हें केवल जमीन के बदले मुआवजा देने के बजाय विकसित रिहायशी और व्यावसायिक भूखंडों में उचित हिस्सा दिया जाए। इससे किसान भविष्य में भी अपनी जमीन से आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकेंगे।

सतिंदर पाल सिंह सिद्धू ने कहा कि किसान विकास के विरोध में नहीं हैं। वे चाहते हैं कि शहर का विकास किसानों को साथ लेकर किया जाए, न कि उनके हितों को नजरअंदाज करके। लैंड पूलिंग पॉलिसी लागू होने से जमीन मालिकों को विकास का भागीदार बनाया जा सकता है। इससे अनियोजित निर्माण पर भी रोक लगाने में मदद मिल सकती है।

प्रशासन से पारदर्शी नीति बनाने की मांग

किसानों ने चंडीगढ़ प्रशासन से मांग की है कि सभी 22 गांवों के लिए जल्द से जल्द व्यापक लैंड पूलिंग पॉलिसी तैयार की जाए। इसमें हरियाणा और पंजाब की नीतियों को ध्यान में रखते हुए किसानों के हितों की सुरक्षा की जानी चाहिए।

उनकी प्रमुख मांगों में विकसित जमीन में उचित हिस्सेदारी, पारदर्शी मुआवजा व्यवस्था, बुनियादी सुविधाओं का विकास और मूल जमीन मालिकों के अधिकारों की सुरक्षा शामिल है।

किसानों का कहना है कि नीति तैयार करते समय गांवों के लोगों और जमीन मालिकों से बातचीत की जानी चाहिए। उनकी आपत्तियों और सुझावों को शामिल करके ऐसा मॉडल बनाया जाना चाहिए, जिससे विकास परियोजनाओं में किसानों की भूमिका सुनिश्चित हो सके।

पहले भी कई बार उठ चुका है लैंड पूलिंग का मुद्दा

चंडीगढ़ में लैंड पूलिंग पॉलिसी की मांग नई नहीं है। शहर के 22 गांवों के किसान लंबे समय से इस मुद्दे को प्रशासन के सामने उठा रहे हैं। मार्च 2026 में भी किसानों ने सारंगपुर बैरियर पर प्रदर्शन किया था। उस दौरान लैंड पूलिंग पॉलिसी लागू करने के साथ लाल डोरा खत्म करने, कलेक्टर रेट को बाजार भाव के अनुसार करने और गांवों से जुड़ी अन्य मांगें भी उठाई गई थीं।

इससे पहले चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से लैंड पूलिंग की संभावनाओं पर विचार किया गया था, लेकिन फरवरी 2026 में मुख्य सचिव एच. राजेश प्रसाद ने स्पष्ट किया था कि प्रशासन फिलहाल इस नीति के पक्ष में नहीं है। प्रशासन का तर्क था कि मास्टर प्लान-2031 के तहत जमीन का इस्तेमाल पहले से निर्धारित है और भविष्य की विकास परियोजनाओं के लिए जमीन सुरक्षित रखना जरूरी है।

हालांकि, बाद में 22 गांवों के किसानों से सुझाव और आपत्तियां लेकर नीति का प्रारूप तैयार करने की संभावनाएं भी सामने आई थीं। इसके बावजूद अभी तक चंडीगढ़ में हरियाणा जैसी लैंड पूलिंग पॉलिसी लागू नहीं हुई है।

मांग पूरी नहीं होने पर आंदोलन की चेतावनी

चंडीगढ़ पेंडू विकास मंच ने प्रशासन से इस मांग पर जल्द कार्रवाई करने की अपील की है। मंच का कहना है कि किसानों ने कई बार अपनी समस्याएं और मांगें प्रशासन के सामने रखी हैं, लेकिन अभी तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला है।

संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन किसानों की मांगों को लगातार नजरअंदाज करता रहा तो गांवों के लोग एकजुट होकर लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन शुरू कर सकते हैं।

कुल मिलाकर, हरियाणा सरकार की नई लैंड पूलिंग पॉलिसी के बाद चंडीगढ़ के 22 गांवों के किसानों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। अब किसानों की नजरें चंडीगढ़ प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं। उनका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शहर के विकास में जमीन मालिकों को भी उचित आर्थिक लाभ और अधिकार मिलें।

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