31 अक्तूबर 2026: दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी गौचर (Gaucher) की समय पर पहचान न होना मरीजों और उनके परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। चंडीगढ़ स्थित पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGI) की बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. इनुषा पाणिग्रही ने कहा है कि बीमारी के बारे में जागरूकता की कमी और इलाज तक लगातार पहुंच में आने वाली बाधाएं मरीजों की परेशानी बढ़ाती हैं। उन्होंने समय पर निदान, उचित उपचार और लंबे समय तक देखभाल सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय गौचर जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर विशेषज्ञों ने दुर्लभ बीमारी के लक्षणों, समय पर जांच और मरीजों को निरंतर उपचार उपलब्ध कराने के महत्व की ओर ध्यान दिलाया है।
क्या है गौचर बीमारी?
गौचर एक दुर्लभ आनुवंशिक मेटाबॉलिक बीमारी है। यह शरीर में ग्लूकोसेरेब्रोसिडेज नामक एंजाइम की कमी के कारण होती है। इस कमी से कुछ प्रकार के वसायुक्त पदार्थ कोशिकाओं में जमा होने लगते हैं, जिससे शरीर के अलग-अलग अंग प्रभावित हो सकते हैं।
इस बीमारी का असर मुख्य रूप से तिल्ली, लीवर और हड्डियों पर पड़ सकता है। मरीजों में खून से जुड़ी समस्याएं, शरीर के विकास में बाधा और हड्डियों में विकृति जैसी परेशानियां देखी जा सकती हैं। यह बीमारी बच्चों के साथ-साथ वयस्कों को भी प्रभावित कर सकती है।
लक्षण अलग-अलग होने से पहचान में होती है देरी
गौचर बीमारी के लक्षण और उनकी गंभीरता हर मरीज में अलग हो सकती है। कई बार इसके संकेत दूसरी सामान्य बीमारियों जैसे दिखाई देते हैं। इसी वजह से मरीज को सही बीमारी का पता चलने में लंबा समय लग सकता है।
डॉ. पाणिग्रही के अनुसार, डॉक्टरों और आम लोगों में इस बीमारी को लेकर जागरूकता बढ़ाना जरूरी है। यदि बीमारी की पहचान देर से होती है, तो खासकर बच्चों में शारीरिक विकास, वृद्धि और जीवन की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी से मिलती है मदद
गौचर बीमारी के पात्र मरीजों के इलाज में एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी (ERT) महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस उपचार में शरीर में कमी वाले एंजाइम की पूर्ति के लिए नियमित रूप से एंजाइम दिया जाता है। इससे बीमारी के कई लक्षणों को नियंत्रित करने और मरीज की स्थिति में सुधार लाने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, उपचार का लाभ बनाए रखने के लिए डॉक्टरों की निगरानी और नियमित इलाज जरूरी है। डॉ. पाणिग्रही ने बताया कि थेरेपी में रुकावट आने पर खून से जुड़ी समस्याएं दोबारा उभर सकती हैं। लीवर और तिल्ली का आकार बढ़ने तथा हड्डियों से जुड़ी परेशानियां भी फिर से गंभीर हो सकती हैं।
समय पर इलाज और निरंतर देखभाल जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि दुर्लभ बीमारियों के मामले में केवल निदान और उपचार की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है। मरीजों को लंबे समय तक इलाज जारी रखने के लिए उचित स्वास्थ्य सेवाएं और सहयोग मिलना भी जरूरी है।
गौचर बीमारी के प्रति डॉक्टरों और समुदाय में जागरूकता बढ़ने से समय पर जांच और विशेषज्ञों तक रेफरल में मदद मिल सकती है। इसके साथ ही मरीजों और परिवारों को बीमारी की आनुवंशिक प्रकृति, उपचार के विकल्पों और उपलब्ध सहायता के बारे में सही जानकारी देना भी महत्वपूर्ण है।
डॉ. पाणिग्रही ने कहा कि दुर्लभ बीमारियों के प्रबंधन में प्रगति का आकलन केवल पहचाने गए मरीजों या उपलब्ध उपचारों से नहीं, बल्कि इस बात से भी होना चाहिए कि मरीजों को समय पर और लगातार देखभाल मिल रही है या नहीं।
