12 अक्टूबर 2026: हरियाणा के करनाल जिले में धान खरीद प्रक्रिया राइस मिलर्स की कमी के कारण प्रभावित हो रही है। सरकारी खरीद व्यवस्था के तहत धान की मिलिंग और चावल की डिलीवरी में अहम भूमिका निभाने वाले कई राइस मिलर्स इस सीजन में शामिल नहीं हो पा रहे हैं। इसके पीछे पिछले सीजन के चावल की लंबित डिलीवरी, कथित फर्जी खरीद से जुड़े पुलिस मामलों और पंजीकरण प्रक्रिया को लेकर मिलर्स की चिंताएं बताई जा रही हैं।
पिछले सीजन का 1.60 लाख मीट्रिक टन चावल लंबित
राइस मिलर्स के अनुसार, करनाल जिले में पिछले धान खरीद सीजन का लगभग 1.60 लाख मीट्रिक टन कस्टम मिल्ड राइस (CMR) अभी भी लंबित है। सरकारी नीति के तहत जिन मिलर्स ने पिछले सीजन का चावल भारतीय खाद्य निगम (FCI) को पूरी तरह नहीं सौंपा है, उन्हें डिफॉल्टर माना जाता है। ऐसे मिलर्स को नए सीजन की कस्टम मिलिंग प्रक्रिया में शामिल होने से रोका जा सकता है।
इस स्थिति के कारण कई मिलर्स नए सीजन में भाग लेने में असमर्थ हैं। इससे सरकारी खरीद एजेंसियों के सामने धान की खरीद और आगे की प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने की चुनौती खड़ी हो गई है।
मिलर्स ने बताई अपनी परेशानी
करनाल राइस मिलर्स एंड डीलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सौरभ गुप्ता के अनुसार, मिलर्स का चावल तैयार है, लेकिन भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में जगह नहीं मिलने के कारण उसकी डिलीवरी अटकी हुई है। उनका कहना है कि डिलीवरी में देरी के चलते मिलर्स को डिफॉल्टर की श्रेणी में रखा जा रहा है, जबकि उनके मुताबिक यह देरी काफी हद तक उनके नियंत्रण से बाहर है।
मिलर्स ने मांग की है कि पिछले सीजन का लंबित चावल स्वीकार किया जाए, ताकि उन्हें डिफॉल्टर की श्रेणी से बाहर कर मौजूदा सीजन की खरीद और मिलिंग प्रक्रिया में शामिल होने का अवसर मिल सके।
गोदामों में जगह की कमी भी बड़ी वजह
जुंडला राइस मिलर्स एसोसिएशन से जुड़े राजिंदर मोंगा ने भी पिछले सीजन की डिलीवरी में देरी के पीछे कई कारण बताए हैं। इनमें FCI के गोदामों में जगह की कमी, फोर्टिफाइड राइस कर्नेल्स (FRK) की आपूर्ति में देरी और गेहूं के सीजन के दौरान मजदूरों की कमी जैसी समस्याएं शामिल हैं।
मिलर्स का कहना है कि इन परिचालन संबंधी दिक्कतों के कारण चावल की डिलीवरी समय पर पूरी नहीं हो सकी। अब पुराने स्टॉक के लंबित रहने का असर नए सीजन में उनकी भागीदारी पर पड़ रहा है।
सरकारी खरीद एजेंसियों के सामने चुनौती
राइस मिलर्स की कम भागीदारी के कारण सरकारी खरीद एजेंसियों को अनाज मंडियों में किसानों का धान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। धान की सरकारी खरीद में मिलर्स की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि खरीदे गए धान की मिलिंग के बाद चावल को निर्धारित नियमों के अनुसार सरकार और FCI को सौंपना होता है।
मिलर्स की कमी से खरीद प्रक्रिया की गति प्रभावित होने पर किसानों को भी इंतजार करना पड़ सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, करनाल की कुछ मंडियों में किसानों को अपनी फसल निजी व्यापारियों को MSP से कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इससे किसानों की चिंता बढ़ गई है।
किसानों की आमदनी पर पड़ सकता है असर
धान खरीद में देरी किसानों के लिए आर्थिक परेशानी पैदा कर सकती है। फसल बेचने में अधिक समय लगने से उन्हें भुगतान का इंतजार करना पड़ सकता है और अगली कृषि गतिविधियों के लिए धन की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, हर किसान को MSP से कम कीमत मिलने की स्थिति नहीं है, लेकिन जहां सरकारी खरीद सुचारू रूप से नहीं हो पाती, वहां किसानों के सामने निजी व्यापारियों को फसल बेचने का दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में खरीद प्रक्रिया को जल्द सामान्य करना जरूरी माना जा रहा है।
समाधान के लिए लंबित मुद्दों का निपटारा जरूरी
मिलर्स की मांग है कि पिछले सीजन के लंबित चावल की डिलीवरी से जुड़े मुद्दों का समाधान किया जाए और मौजूदा सीजन में अधिक से अधिक मिलर्स को भाग लेने का अवसर मिले। वहीं, सरकारी खरीद व्यवस्था के सामने चुनौती यह है कि पुराने स्टॉक का निपटारा करते हुए मौजूदा सीजन में किसानों से धान की खरीद भी समय पर सुनिश्चित की जाए।
