28 सितंबर 2026 हरियाणा की नर्सिंग अधिकारी डॉ. आशा झाझरिया की कहानी संघर्ष, हिम्मत और लक्ष्य के प्रति दृढ़ता की मिसाल है। गंभीर रीढ़ की चोट के बाद कई महीनों तक बिस्तर पर रहने वाली आशा ने न केवल दोबारा अपने पैरों पर खड़े होकर चलना शुरू किया, बल्कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट सहित तीन महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों को भी फतह किया। वह एयर पिस्टल शूटिंग में भी राज्य और प्री-नेशनल स्तर पर पदक जीत चुकी हैं।
राजस्थान के गांव से हरियाणा तक का सफर
आशा झाझरिया मूल रूप से राजस्थान के झुंझुनूं जिले के घड़ाना खुर्द गांव की रहने वाली हैं। उनकी शादी कम उम्र में महेंद्रगढ़ जिले के बालाहा खुर्द गांव में हुई थी। शादी के बाद उन्होंने राजस्थान सरकार के स्वास्थ्य विभाग में नौकरी के लिए आवेदन किया था।
आशा के मुताबिक, उनकी नियुक्ति का पत्र उस समय आया जब उनकी बेटी का जन्म हुआ था। बेटी केवल 13 दिन की थी, जब वह उसे साथ लेकर अपनी ड्यूटी ज्वाइन करने पहुंचीं। बाद में उनके एक बेटे का भी जन्म हुआ और परिवार तथा नौकरी की जिम्मेदारियां चलती रहीं।
2014 में हादसे ने बदल दी जिंदगी
साल 2014 में 36 वर्ष की उम्र में आशा एक हादसे का शिकार हुईं और उनकी रीढ़ में गंभीर चोट आई। चोट इतनी गंभीर थी कि वह कई महीनों तक बिस्तर पर रहीं। डॉक्टरों को भी उनके पूरी तरह ठीक होने को लेकर आशंका थी।
आशा ने बताया कि उस समय कुछ करीबी लोगों ने भी उन्हें बोझ समझना शुरू कर दिया था। लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय धीरे-धीरे खुद को संभालना शुरू किया। उन्होंने छोटे-छोटे कदम उठाते हुए दोबारा खड़ा होना और अपने पैरों पर चलना सीखा।
अमरनाथ यात्रा ने दिखाई नई राह
चोट से उबरने के बाद आशा ने साल 2015 में अमरनाथ यात्रा की। इसी दौरान एक सेना के जवान ने उनकी मजबूत चाल देखकर उनसे कहा कि वह एक दिन माउंट एवरेस्ट पर चढ़ सकती हैं।
आशा के अनुसार, यह बात उनके मन में बैठ गई। वापस लौटने के बाद उन्होंने एवरेस्ट पर चढ़ाई की संभावनाओं के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की। उन्होंने Google और YouTube के जरिए पर्वतारोहण से जुड़ी जानकारी हासिल की और अपने लक्ष्य की दिशा में तैयारी शुरू कर दी।
पर्वतारोहण की ट्रेनिंग लेकर शुरू किया मिशन एवरेस्ट
माउंट एवरेस्ट फतह करने के लिए आशा ने हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट से बेसिक और एडवांस पर्वतारोहण कोर्स किए। इसके बाद उन्होंने अपनी बचत, रिश्तेदारों की मदद और क्राउडफंडिंग के जरिए अभियान के लिए धन जुटाया।
साल 2017 में उनका मिशन एवरेस्ट शुरू हुआ। चढ़ाई के दौरान उन्हें बेहद कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि अभियान के दौरान रास्ते में कई पर्वतारोहियों के शव भी दिखाई दिए। एक समय उनके मन में वापस लौटने का विचार भी आया, लेकिन उन्होंने खुद को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। करीब 40 दिन के कठिन अभियान के बाद उन्होंने माउंट एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक चढ़ाई पूरी की।
एवरेस्ट के बाद एयर पिस्टल शूटिंग में बनाई पहचान
माउंट एवरेस्ट फतह करने के बाद आशा ने अपने परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए एयर पिस्टल शूटिंग की ओर भी रुख किया। इस खेल में उन्होंने राज्य और प्री-नेशनल स्तर पर कई पदक और पुरस्कार हासिल किए।
इसके साथ ही उन्होंने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी और अंग्रेजी साहित्य में पीएचडी पूरी की। इस तरह नौकरी, परिवार, खेल, शिक्षा और पर्वतारोहण के बीच उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई।
आठ साल बाद फिर शुरू किया पर्वतारोहण
एवरेस्ट फतह करने के बाद करीब आठ साल तक पर्वतारोहण से दूर रहने के बाद आशा ने हाल ही में फिर से इस जुनून को आगे बढ़ाया। पिछले महीने उन्होंने यूरोप की सबसे ऊंची चोटी माउंट एल्ब्रुस और अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी माउंट किलिमंजारो को फतह किया।
इस तरह माउंट एवरेस्ट के साथ उन्होंने तीन महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों पर पहुंचने की उपलब्धि हासिल की।
अब बाकी महाद्वीपों की चोटियों का लक्ष्य
आशा अब दुनिया के बाकी चार महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों तक पहुंचने का लक्ष्य रखती हैं। उन्होंने कहा कि अगर उन्हें इसके लिए जरूरी आर्थिक सहयोग मिल जाता है, तो वह अपने इस लक्ष्य को भी पूरा करना चाहती हैं।
उनकी यात्रा यह दिखाती है कि गंभीर शारीरिक चुनौती के बाद भी उन्होंने अपने जीवन की दिशा बदलने की कोशिश की। रीढ़ की चोट से उबरने से लेकर एवरेस्ट और अन्य ऊंची चोटियों तक पहुंचने का उनका सफर उनके जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय बन चुका है।
