19 सितंबर, 2026 : दिल्ली में DTC बस कर्मचारियों की हड़ताल ने राजधानी की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यह विवाद केवल वेतन बढ़ाने की मांग तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इससे दिल्ली में बस संचालन के लिए आउटसोर्सिंग और निजी एजेंसियों पर निर्भरता को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। हड़ताल के कारण बड़ी संख्या में बसें सड़कों से बाहर रहीं और यात्रियों को मेट्रो, ऑटो और कैब जैसे वैकल्पिक साधनों पर निर्भर होना पड़ा।
करीब 12 हजार ड्राइवर और कंडक्टर प्रदर्शन से जुड़े
रिपोर्ट के अनुसार, करीब 12,000 ड्राइवर और कंडक्टर इस विरोध से जुड़े हुए हैं। कर्मचारियों की हड़ताल का असर बस संचालन पर पड़ा है और कई यात्रियों को बस स्टॉप पर लंबा इंतजार करना पड़ा। दूसरी ओर, दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन ने अतिरिक्त यात्रियों के दबाव को देखते हुए कुछ अतिरिक्त ट्रेनें और ट्रिप संचालित कीं।
हड़ताल के बीच DTC ने बस सेवाओं को सामान्य करने के लिए 2,693 कॉन्ट्रैक्चुअल ड्राइवरों को अलग-अलग डिपो में अस्थायी रूप से तैनात किया। इसके बावजूद कई रूटों पर देरी और बसों की कमी की स्थिति बनी रही।
कर्मचारियों की मांग केवल वेतन बढ़ाने तक सीमित नहीं
कर्मचारियों की ओर से रखी गई नौ सूत्रीय मांगों में दैनिक वेतन बढ़ाने की मांग प्रमुख है। रिपोर्ट के अनुसार, कर्मचारी करीब ₹2,000 प्रतिदिन वेतन की मांग कर रहे हैं, जबकि वर्तमान भुगतान लगभग ₹747 से ₹862 प्रतिदिन बताया गया है।
कर्मचारियों का तर्क है कि भारी बस चलाने वाले ड्राइवरों के पास आवश्यक लाइसेंस और प्रशिक्षण होता है, इसलिए उनके काम की प्रकृति और जिम्मेदारी के अनुसार वेतन और वर्गीकरण होना चाहिए।
इसके अलावा महंगाई भत्ते में संशोधन, लंबित बेसिक पे बढ़ोतरी, सरकारी छुट्टियों में काम का भुगतान, कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के लिए वार्षिक बोनस, मेडिकल सुविधा, बीमा, सामाजिक सुरक्षा और पेड लीव जैसी मांगें भी शामिल हैं।
पुराने कर्मचारियों के वर्गीकरण पर भी सवाल
हड़ताल से जुड़े कर्मचारियों की एक मांग यह भी है कि उनके पद और वेतन का निर्धारण उनके काम के अनुभव के आधार पर किया जाए। रिपोर्ट में बताया गया है कि 10 से 15 साल का अनुभव रखने वाले कुछ ड्राइवर अभी भी अनस्किल्ड वर्कर के रूप में वर्गीकृत हैं।
कर्मचारियों का कहना है कि बस ड्राइविंग में लंबे अनुभव और जिम्मेदारी को देखते हुए वर्गीकरण और वेतन व्यवस्था पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए।
आउटसोर्स मॉडल पर क्यों हो रही चर्चा?
इस पूरे विवाद का एक बड़ा पहलू यह है कि दिल्ली की बस व्यवस्था में कर्मचारियों का एक हिस्सा सीधे सार्वजनिक परिवहन ऑपरेटर के बजाय निजी एजेंसियों या कंसेशनायर के माध्यम से काम करता है। ऐसे में बस सेवा की जिम्मेदारी और कर्मचारियों की सेवा शर्तों की जिम्मेदारी अलग-अलग संस्थाओं के बीच बंट जाती है।
रिपोर्ट के अनुसार, सरकार का पक्ष यह है कि प्रदर्शन कर रहे कर्मचारी निजी कंसेशनायर के माध्यम से नियुक्त हुए हैं और उन्हें अपनी मांगों को संबंधित एजेंसियों के साथ बातचीत के जरिए सुलझाना चाहिए। लेकिन यात्रियों के लिए यह अंतर ज्यादा मायने नहीं रखता कि बस चलाने वाला कर्मचारी सीधे सरकारी संस्था का कर्मचारी है या किसी निजी एजेंसी के माध्यम से काम कर रहा है। बस नहीं आने पर उसका सीधा असर यात्री पर पड़ता है।
बस सेवा रुकने का असर यात्रियों पर
बसें दिल्ली के उन इलाकों तक भी सार्वजनिक परिवहन पहुंचाती हैं जहां मेट्रो की सीधी सुविधा उपलब्ध नहीं है। इसलिए बस सेवा में व्यवधान का असर केवल बस यात्रियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी पर भी पड़ता है।
हड़ताल के दौरान यात्रियों का रुख मेट्रो, ऑटो-रिक्शा और कैब की तरफ बढ़ा। हालांकि मेट्रो कुछ प्रमुख मार्गों पर अतिरिक्त दबाव संभाल सकती है, लेकिन बस और मेट्रो पूरी तरह एक-दूसरे का विकल्प नहीं हैं। कई यात्रियों को बस की जगह ऑटो या कैब लेने पर अतिरिक्त खर्च भी करना पड़ सकता है।
DTC की व्यवस्था और पुराने सवाल
DTC की बस व्यवस्था को लेकर इससे पहले भी संचालन, बसों की उपलब्धता, रूट प्लानिंग और फ्लीट के इस्तेमाल जैसे मुद्दे सामने आते रहे हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की DTC पर प्रदर्शन ऑडिट रिपोर्ट में भी बसों की खरीद में देरी, कम फ्लीट उपयोग, रूट प्लानिंग और अन्य संचालन संबंधी कमियों को रेखांकित किया गया था।
मौजूदा हड़ताल ने इस सवाल को फिर सामने ला दिया है कि सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को केवल बसों और डिपो के आधार पर नहीं देखा जा सकता। बस संचालन के लिए पर्याप्त और स्थिर कार्यबल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
आगे समाधान में किन मुद्दों पर हो सकती है चर्चा?
हड़ताल खत्म करने के लिए बातचीत केवल दैनिक वेतन तक सीमित रहती है या कर्मचारियों की पूरी सेवा व्यवस्था पर चर्चा होती है, यह आगे महत्वपूर्ण रहेगा। महंगाई भत्ता, वेतन वृद्धि, छुट्टियां, मेडिकल सुविधा, बीमा, सामाजिक सुरक्षा और कर्मचारियों के वर्गीकरण जैसे मुद्दे भी इस विवाद का हिस्सा हैं।
वहीं, लंबे समय के स्तर पर आउटसोर्सिंग मॉडल में जवाबदेही और कर्मचारियों की सेवा शर्तों को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बनाए रखना भी चर्चा का विषय हो सकता है।
फिलहाल यात्रियों के लिए सबसे बड़ी चिंता बस सेवाओं की बहाली है। हड़ताल ने यह भी दिखाया है कि दिल्ली जैसी बड़ी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था में ड्राइवर और कंडक्टरों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। बसें, डिपो और रूट तैयार होने के बावजूद पर्याप्त कार्यबल के बिना सेवा को नियमित रखना मुश्किल हो सकता है।
