23 मई 2026 : हरियाणा में कृषि विभाग धान की खेती के लिए डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक का दायरा लगातार बढ़ाने पर जोर दे रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य भूजल संरक्षण, खेती की लागत कम करना और कृषि को अधिक टिकाऊ बनाना है।
जानकारी के अनुसार, पारंपरिक धान रोपाई पद्धति में बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत DSR तकनीक में धान की सीधी बुवाई की जाती है, जिससे सिंचाई के लिए कम पानी की जरूरत पड़ती है।
हरियाणा कृषि विभाग का मानना है कि राज्य में लगातार गिरते भूजल स्तर को देखते हुए DSR तकनीक को बढ़ावा देना आवश्यक हो गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, हरियाणा के कई जिलों में भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। धान की पारंपरिक खेती को इसकी प्रमुख वजहों में से एक माना जाता है।
DSR तकनीक से किसानों को श्रम लागत कम करने में भी मदद मिल सकती है, क्योंकि इसमें धान की पौध तैयार करने और रोपाई के लिए अतिरिक्त मजदूरों की आवश्यकता कम होती है।
भारत में जल संरक्षण और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न राज्यों में नई तकनीकों पर जोर दिया जा रहा है।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि DSR पद्धति अपनाने से समय की बचत, कम पानी का उपयोग और पर्यावरणीय लाभ मिल सकते हैं। हालांकि, इसके लिए उचित प्रशिक्षण और खरपतवार नियंत्रण जैसी चुनौतियों का समाधान भी जरूरी है।
सूत्रों के मुताबिक, कृषि विभाग किसानों को इस तकनीक के प्रति जागरूक करने और प्रोत्साहन देने के लिए विभिन्न योजनाएं चला रहा है। कई क्षेत्रों में प्रशिक्षण शिविर और जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे हैं।
हरियाणा देश के प्रमुख कृषि राज्यों में शामिल है और यहां धान-गेहूं फसल चक्र बड़े स्तर पर अपनाया जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जल संरक्षण के प्रभावी उपाय नहीं किए गए तो भविष्य में सिंचाई और कृषि उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है।
फिलहाल, कृषि विभाग DSR के तहत अधिक क्षेत्र लाने की दिशा में काम कर रहा है। आने वाले समय में इसके परिणाम राज्य की जल संरक्षण नीति और कृषि अर्थव्यवस्था पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं।
यह घटनाक्रम यह दर्शाता है कि बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों के बीच टिकाऊ और जल-संरक्षण आधारित कृषि तकनीकों की आवश्यकता तेजी से बढ़ रही है।
