14 अक्टूबर 2026: उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की 11 शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार की कमान संभाल ली है। वहीं, समाजवादी पार्टी (SP) के प्रमुख अखिलेश यादव ने दो उम्मीदवारों को बदलकर मुकाबले को नया मोड़ दिया है। इन चुनावों को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और सपा की राजनीतिक ताकत परखने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
11 सीटों पर भाजपा और सपा की नजर
उत्तर प्रदेश विधान परिषद की पांच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की कुल 11 सीटों पर चुनाव होने हैं। चुनाव में भाजपा का लक्ष्य अधिक से अधिक सीटें जीतकर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करना है। दूसरी ओर, सपा स्थानीय समीकरणों और उम्मीदवारों के चयन के जरिए भाजपा को चुनौती देने की तैयारी में जुटी है।
भाजपा ने चुनाव प्रचार को गंभीरता से लेते हुए वरिष्ठ नेताओं को अलग-अलग क्षेत्रों की जिम्मेदारी सौंपी है। पार्टी की रणनीति मतदाताओं तक सीधे पहुंचने और संगठन के कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने पर केंद्रित है।
सीएम योगी ने खुद संभाली प्रचार की कमान
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भाजपा उम्मीदवारों के समर्थन में विभिन्न जिलों में बैठकें और जनसभाएं कर रहे हैं। गोरखपुर से लेकर बरेली और अन्य क्षेत्रों तक उनका प्रचार अभियान पार्टी की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है।
भाजपा के लिए ये चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं। पार्टी इन सीटों के जरिए शिक्षकों, स्नातकों और स्थानीय मतदाताओं के बीच अपना समर्थन मजबूत करना चाहती है। मुख्यमंत्री की सक्रियता को इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
अखिलेश यादव ने क्यों बदले दो उम्मीदवार?
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने चुनावी रणनीति के तहत दो उम्मीदवारों को बदलने का फैसला किया। पार्टी ने गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से कमलेश यादव की जगह संजयन त्रिपाठी को उम्मीदवार बनाया। वहीं, आगरा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में पहले घोषित उम्मीदवार के स्थान पर आकाश अग्रवाल को टिकट दिया गया।
संजयन त्रिपाठी भाजपा से जुड़े रहे हैं, जबकि आकाश अग्रवाल भी भाजपा से टिकट पाने के इच्छुक थे। ऐसे में सपा के इस फैसले को भाजपा के भीतर टिकट वितरण से असंतुष्ट नेताओं और उनके समर्थकों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, इसका चुनावी असर मतदाताओं के समर्थन और स्थानीय समीकरणों पर निर्भर करेगा।
पहला कारण: भाजपा के असंतुष्ट नेताओं को साधने की कोशिश
अखिलेश यादव के उम्मीदवार बदलने के फैसले के पीछे एक संभावित कारण भाजपा के उन नेताओं और दावेदारों को मौका देना है, जिन्हें पार्टी से टिकट नहीं मिला। संजयन त्रिपाठी और आकाश अग्रवाल जैसे उम्मीदवारों को मैदान में उतारकर सपा मुकाबले को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की कोशिश कर रही है।
ऐसे उम्मीदवारों के साथ स्थानीय समर्थकों का कितना वोट जुड़ता है, यह चुनाव में अहम हो सकता है। लेकिन केवल उम्मीदवार बदलने से जीत सुनिश्चित नहीं होती; संगठन, प्रचार और मतदाताओं तक पहुंच भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
