17 अगस्त 2026 : उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर इन दिनों अपने लगातार सख्त फैसलों को लेकर चर्चा में हैं। उनकी अदालत ने अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच 10 अलग-अलग मामलों में 22 दोषियों को मौत की सजा सुनाई है। इन मामलों में वकील की हत्या, होमगार्ड की हत्या, हाईवे पर लूट के बाद हत्या और अन्य गंभीर अपराध शामिल हैं।
कौन हैं जज रवि कुमार दिवाकर?
रवि कुमार दिवाकर मूल रूप से लखनऊ के रहने वाले हैं और उनकी उम्र करीब 46 वर्ष है। उन्होंने B.Com और LLM की पढ़ाई की है। उन्होंने वर्ष 2009 में आजमगढ़ में अतिरिक्त सिविल जज के रूप में न्यायिक सेवा की शुरुआत की थी। मई 2015 में उन्हें सिविल जज के पद पर पदोन्नत किया गया और बाद में उन्होंने न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में भी काम किया।
नवंबर 2025 से वह मुजफ्फरनगर में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में तैनात हैं। उनकी अदालत फास्ट-ट्रैक कोर्ट के रूप में भी गंभीर आपराधिक मामलों की सुनवाई कर रही है।
चार महीने में 22 मौत की सजाएं
रवि कुमार दिवाकर की अदालत द्वारा अप्रैल से अगस्त के बीच दिए गए फैसलों में मौत की सजाओं का सिलसिला लगातार जारी रहा। उपलब्ध विवरण के अनुसार, 6 अप्रैल को तीन, 28 अप्रैल को चार, 20 मई को एक और 20 जून को दो दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई।
जुलाई में 2 जुलाई को एक, 6 जुलाई को दो और 17 जुलाई को चार दोषियों को मौत की सजा दी गई। अगस्त में 12 अगस्त को एक और 13 अगस्त को चार दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई। इस तरह कुल संख्या 22 तक पहुंच गई।
इन मामलों में कई पुराने और गंभीर अपराध शामिल थे। 12 अगस्त को अदालत ने करीब 27 साल पुराने अपहरण और हत्या के मामले में शाहनवाज को मौत की सजा सुनाई। अभियोजन के अनुसार, लकड़ी कारोबारी सलीम का फिरौती के लिए अपहरण कर हत्या की गई थी।
इसके अगले दिन 13 अगस्त को 2014 के पवन कुमार हत्याकांड में चार लोगों—रामवीर, राजीव, राहुल और हरेंद्र कुमार—को मौत की सजा सुनाई गई। अदालत ने प्रत्येक पर जुर्माना भी लगाया।
ज्ञानवापी मामले से भी जुड़े रहे हैं
रवि कुमार दिवाकर का नाम इससे पहले वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर के वीडियोग्राफी सर्वे का आदेश देने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था। 2022 में वह वाराणसी में सिविल जज के पद पर थे और उनके आदेश के बाद ज्ञानवापी परिसर के सर्वे का मामला देशभर में सुर्खियों में आया था।
इस वजह से उनके न्यायिक करियर में ज्ञानवापी मामले का आदेश एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। अब मुजफ्फरनगर में लगातार मौत की सजाओं के कारण उनका नाम फिर चर्चा में है।
क्या 22 मौत की सजाओं का मतलब तुरंत फांसी है?
नहीं। यह बात समझना बेहद जरूरी है। सत्र अदालत द्वारा दी गई मौत की सजा तुरंत लागू नहीं होती। कानून के तहत ऐसी सजा को संबंधित हाईकोर्ट से पुष्टि मिलना अनिवार्य है। हाईकोर्ट मामले की सुनवाई के दौरान सजा की पुष्टि कर सकता है, उसे बदल सकता है या आरोपी को राहत दे सकता है।
इसलिए मुजफ्फरनगर अदालत द्वारा सुनाई गई 22 मौत की सजाएं अभी न्यायिक प्रक्रिया के अगले चरण से गुजरेंगी।
मौत की सजा पर कानूनी बहस भी तेज
इतने कम समय में बड़ी संख्या में मौत की सजाएं दिए जाने से ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ सिद्धांत को लेकर कानूनी बहस भी सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुसार मौत की सजा केवल अत्यंत गंभीर मामलों में दी जानी चाहिए और अदालतों को दोषी की परिस्थितियों सहित कई पहलुओं पर विचार करना होता है।
इसी वजह से जज दिवाकर की अदालत के हालिया फैसलों को केवल संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि प्रत्येक मामले के तथ्यों और आगे होने वाली हाईकोर्ट की समीक्षा के संदर्भ में देखना महत्वपूर्ण है।
कुल मिलाकर, जज रवि कुमार दिवाकर का न्यायिक करियर 2009 से शुरू हुआ और आज वह मुजफ्फरनगर में गंभीर आपराधिक मामलों की सुनवाई कर रहे हैं। चार महीनों में 10 मामलों में 22 मौत की सजाओं ने उन्हें राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया है। हालांकि, इन सभी मामलों में अंतिम कानूनी स्थिति हाईकोर्ट की पुष्टि और आगे की न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही तय होगी।
