22 मई 2026 : पंजाब में गेहूं की पराली और खेतों में बचे अवशेष जलाने की घटनाओं ने भीषण गर्मी और हीटवेव की स्थिति को और गंभीर बना दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि खेतों में आग लगने से न केवल तापमान बढ़ता है, बल्कि वायु गुणवत्ता पर भी नकारात्मक असर पड़ता है।
जानकारी के अनुसार, फसल कटाई के बाद कई क्षेत्रों में किसान खेत साफ करने के लिए अवशेष जलाने का तरीका अपनाते हैं। हालांकि, इससे वातावरण में धुआं और गर्म गैसें फैलती हैं, जिससे गर्मी और प्रदूषण दोनों बढ़ सकते हैं।
भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, पहले से चल रही हीटवेव परिस्थितियों के बीच आग और धुएं का असर स्थानीय मौसम पर अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकता है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि पराली जलाने से कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है और हवा में सूक्ष्म कण फैलते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं।
पंजाब और आसपास के क्षेत्रों में पिछले कुछ दिनों से तापमान लगातार ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। कई जिलों में लू जैसी स्थिति देखी जा रही है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, किसानों को खेत प्रबंधन के वैकल्पिक उपाय अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ताकि फसल अवशेषों का सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल उपयोग हो सके।
भारत में पराली जलाने का मुद्दा हर वर्ष पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी बड़ी चिंता के रूप में सामने आता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि धुएं और अत्यधिक गर्मी का असर बुजुर्गों, बच्चों और सांस संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों पर अधिक पड़ सकता है।
सरकार और प्रशासन की ओर से किसानों को जागरूक करने तथा मशीनों और वैकल्पिक तकनीकों के उपयोग को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं।
फिलहाल, मौसम विभाग और प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियां स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि हीटवेव और प्रदूषण से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास और दीर्घकालिक समाधान जरूरी हैं।
यह घटनाक्रम यह दर्शाता है कि कृषि प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाए रखना आज बड़ी चुनौती बन चुका है।
