2 सितंबर 2026 : पंजाब के तरनतारन जिले का सखिरा गांव सिख इतिहास और धार्मिक विरासत से गहराई से जुड़ा हुआ है। गांव में स्थित गुरुद्वारा बाबा माई दास और बाबा लखपत आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यह स्थान तीसरे सिख गुरु, श्री गुरु अमर दास जी द्वारा नियुक्त 22 प्रचारकों में शामिल बाबा माई दास की स्मृति और उनकी धार्मिक सेवाओं को संजोए हुए है।
गुरु अमर दास जी के 22 मंजियों में शामिल थे बाबा माई दास
सिख इतिहास के अनुसार, श्री गुरु अमर दास जी ने गुरु नानक देव जी की विचारधारा और शिक्षाओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए 22 प्रचारकों को नियुक्त किया था। इन्हें ‘22 मंजियां’ के नाम से जाना जाता है।
प्रसिद्ध विद्वान भाई कान्ह सिंह नाभा द्वारा लिखे गए महान कोष में इन प्रचारकों के नामों का उल्लेख मिलता है। बाबा माई दास भी इन्हीं प्रचारकों में शामिल थे। उन्हें खास तौर पर माझा क्षेत्र में गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करने की जिम्मेदारी दी गई थी।
गुरु अमर दास जी से मिलने के बाद बदला जीवन
बताया जाता है कि गुरु अमर दास जी से मिलने से पहले बाबा माई दास भी उस समय प्रचलित कई अंधविश्वासों और धार्मिक रूढ़ियों से प्रभावित थे। गुरु अमर दास जी ने उन्हें गुरु नानक देव जी की सच्ची शिक्षाओं से परिचित कराया और आध्यात्मिक समझ का मार्ग दिखाया।
गुरु अमर दास जी बाबा माई दास से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया और माझा क्षेत्र में जाकर गुरमत विचारधारा का प्रचार करने की जिम्मेदारी सौंपी। इसके बाद बाबा माई दास ने क्षेत्र के विभिन्न गांवों में जाकर लोगों तक गुरु साहिब की शिक्षाएं पहुंचाईं।
सखिरा गांव से जुड़ी है खास कहानी
बाबा माई दास प्रचार करते हुए सखिरा गांव पहुंचे। उस समय गांव के लोग एक गंभीर समस्या से परेशान थे। ग्रामीणों के अनुसार, उनकी कई गायें रहस्यमय परिस्थितियों में रोजाना मर रही थीं।
ग्रामीणों ने अपनी परेशानी बाबा माई दास को बताई। उन्होंने ग्रामीणों को एक विशेष जमीन का टुकड़ा खाली करने की सलाह दी और बताया कि वह स्थान किसी संत से जुड़ा हुआ है।
ग्रामीणों ने उनकी सलाह मानते हुए उस जमीन को खाली कर दिया। इसके बाद बाबा माई दास अपने अनुयायियों के साथ वहीं रहने लगे। मान्यता है कि इसके बाद गांव में गायों के मरने का सिलसिला रुक गया और ग्रामीणों ने राहत की सांस ली।
कई वर्षों तक इसी स्थान पर रहे बाबा माई दास
बताया जाता है कि बाबा माई दास ने इसी स्थान पर कई वर्षों तक निवास किया और यहीं से गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का प्रचार करते रहे। बाद में उन्होंने इसी स्थान से अपने सांसारिक जीवन की यात्रा पूरी की।
उनके बाद बाबा मती दास, बाबा निरंजन दास, बाबा नागा और बाबा लखपत ने इस स्थान की सेवा संभाली। उन्होंने भी यहां से सिख धर्म और गुरमत विचारधारा के प्रचार का कार्य जारी रखा।
आज भी लगता है वार्षिक मेला
समय बीतने के साथ सखिरा स्थित यह धार्मिक स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन गया। यहां हर वर्ष मेला आयोजित किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।
मेले के दौरान बाबा माई दास की शिक्षाओं और उनके धार्मिक योगदान के बारे में संगत को जानकारी दी जाती है। गांव के लोगों के लिए यह स्थान केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक भी है।
दिनभर पहुंचती है संगत
गुरुद्वारा बाबा माई दास में स्थानीय लोगों के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। संगत यहां माथा टेकती है और बाबा माई दास तथा उनके बाद इस स्थान की सेवा करने वाले संतों को श्रद्धा से याद करती है।
गांव के निवासियों ने गुरुद्वारा साहिब के प्रबंधन और धार्मिक गतिविधियों को व्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए एक प्रबंध समिति भी बनाई है।
सिख इतिहास की विरासत को संभाल रहा सखिरा
सखिरा गांव की पहचान केवल एक ग्रामीण क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि सिख इतिहास से जुड़े महत्वपूर्ण स्थान के रूप में भी बनी हुई है। बाबा माई दास से जुड़ी परंपराएं आज भी यहां की धार्मिक और सामाजिक स्मृति का हिस्सा हैं।
गुरुद्वारा परिसर में पहुंचने वाली संगत और हर वर्ष आयोजित होने वाला मेला इस बात का प्रमाण है कि सदियों पुरानी यह विरासत आज भी लोगों के बीच जीवित है।
कुल मिलाकर, पंजाब का सखिरा गांव बाबा माई दास की धार्मिक विरासत को आज भी संजोए हुए है। गुरु अमर दास जी द्वारा नियुक्त 22 प्रचारकों में शामिल बाबा माई दास ने माझा क्षेत्र में गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का प्रचार किया था। सखिरा में उनके निवास से जुड़ा गुरुद्वारा आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है।
