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पानीपत में डाइंग उद्योग को बड़ा झटका, रंगाई की दरें 25% तक बढ़ीं; गैस और केमिकल की किल्लत से बढ़ी लागत

9 अक्टूबर 2026: हरियाणा के पानीपत में हैंडलूम और टेक्सटाइल उद्योग की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। कच्चे माल, गैस, रंगों और केमिकल की कीमतों में बढ़ोतरी के बीच डाइंग यूनिट्स ने रंगाई की प्रोसेसिंग दरों में 20 से 25 प्रतिशत तक वृद्धि करने का फैसला लिया है। इससे कपड़ा निर्माताओं और निर्यातकों की उत्पादन लागत पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।

पानीपत डाइंग एसोसिएशन की हालिया बैठक में दरें बढ़ाने का फैसला सर्वसम्मति से लिया गया। इसके अलावा प्रति किलोग्राम 2 रुपये का कार्ट्रिज चार्ज और 3 रुपये का एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ETP) चार्ज लगाने का भी निर्णय किया गया है। एसोसिएशन ने नई दरों की जानकारी शहर के निर्यातकों और घरेलू उद्योगपतियों को दे दी है।

गैस की सप्लाई में कटौती से उत्पादन प्रभावित

पानीपत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री में रंगाई का काम एक महत्वपूर्ण कड़ी है। धागे और कपड़े की रंगाई के बाद ही आगे कई तरह के हैंडलूम उत्पाद तैयार किए जाते हैं। ऐसे में डाइंग यूनिट्स की लागत बढ़ने का असर पूरी उत्पादन श्रृंखला पर पड़ सकता है।

डाइंग एसोसिएशन के अध्यक्ष नितिन अरोड़ा के अनुसार, पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) और लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) की आपूर्ति में व्यवधान के कारण उद्योग को परेशानी हो रही है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 150 से अधिक यूनिट्स LPG पर और लगभग 150 यूनिट्स PNG पर निर्भर हैं।

गैस आपूर्तिकर्ताओं की ओर से सामान्य जरूरत के मुकाबले करीब 60 प्रतिशत गैस ही उपलब्ध कराई जा रही है। उदाहरण के तौर पर, प्रतिदिन 100 किलोग्राम PNG की खपत करने वाली यूनिट को सामान्य दर पर 60 किलोग्राम गैस मिल रही है, जबकि शेष 40 किलोग्राम के लिए 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क देना पड़ रहा है। इससे उत्पादन खर्च और बढ़ रहा है।

रंग और केमिकल 40 से 45 प्रतिशत तक महंगे

डाइंग उद्योग के सामने दूसरी बड़ी चुनौती रंगों और केमिकल की बढ़ती कीमतें हैं। एसोसिएशन के अध्यक्ष के मुताबिक, कई रंग और रसायन पेट्रोलियम आधारित होते हैं तथा खाड़ी देशों और भारत के दूसरे राज्यों से मंगाए जाते हैं।

अंतरराष्ट्रीय संघर्ष और सप्लाई में व्यवधान के बीच इनकी कीमतों में लगभग 40 से 45 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में पुराने रेट पर रंगाई का काम जारी रखना उद्यमियों के लिए मुश्किल होता जा रहा है।

गैस, रंग और केमिकल की बढ़ती कीमतों के साथ अतिरिक्त शुल्क ने डाइंग यूनिट्स की लागत बढ़ा दी है। इसी वजह से एसोसिएशन ने प्रोसेसिंग दरों में संशोधन का फैसला लिया है।

निर्यातकों और घरेलू निर्माताओं पर पड़ेगा असर

डाइंग की दरें बढ़ने से पानीपत के निर्यातकों और घरेलू कपड़ा निर्माताओं को पहले के मुकाबले अधिक भुगतान करना पड़ेगा। रंगाई की लागत टेक्सटाइल उत्पाद तैयार करने के कुल खर्च का हिस्सा होती है। इसलिए इसमें बढ़ोतरी से निर्माताओं के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है।

हालांकि, तैयार उत्पादों की कीमतों में कितनी बढ़ोतरी होगी, यह संबंधित निर्माताओं और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। फिलहाल डाइंग एसोसिएशन ने नई दरों के बारे में उद्योग से जुड़े कारोबारियों को सूचित कर दिया है।

पानीपत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हैंडलूम सिटी के रूप में जाना जाता है। यहां तैयार होने वाले टेक्सटाइल उत्पादों की आपूर्ति घरेलू बाजार के साथ निर्यात कारोबार से भी जुड़ी है। ऐसे में उत्पादन की किसी एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया की लागत बढ़ने से उद्योग के दूसरे हिस्सों पर भी दबाव पड़ सकता है।

सेक्टर-29 में 350 से ज्यादा यूनिट्स

पानीपत में डाइंग उद्योग को व्यवस्थित करने के लिए हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण ने वर्ष 2003 में सेक्टर-29, पार्ट-2 विकसित किया था। इसका उद्देश्य शहर के अलग-अलग हिस्सों में चल रही रंगाई इकाइयों को एक स्थान पर स्थानांतरित करना था।

इस सेक्टर में वर्तमान में 350 से अधिक डाइंग यूनिट्स संचालित हैं। यहां रंगाई के काम के लिए नहर का पानी उपलब्ध कराया जाता है। ये इकाइयां पानीपत की हैंडलूम और टेक्सटाइल उत्पादन श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

अवैध डाइंग यूनिट्स को लेकर भी उठे सवाल

इस बीच, एक उद्योगपति ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर दावा किया कि ड्रेन नंबर-1 और ड्रेन नंबर-2 के किनारे 80 से अधिक अवैध डाइंग यूनिट्स चल रही हैं। आरोप है कि ये इकाइयां वैध अनुमति के बिना काम करती हैं और कम दरों पर सेवाएं देती हैं।

हालांकि, यह दावा संबंधित उद्योगपति का है। इन इकाइयों की स्थिति और आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध रिपोर्ट में नहीं की गई है।

उद्योग के सामने लागत संभालने की चुनौती

पानीपत के डाइंग उद्योग के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती गैस की उपलब्धता और कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के बीच उत्पादन को जारी रखना है। दरों में बढ़ोतरी से डाइंग यूनिट्स को बढ़ती लागत का कुछ बोझ आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है, लेकिन इसका असर कपड़ा निर्माताओं और निर्यातकों पर भी पड़ेगा।

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