5 सितंबर 2026 जलियांवाला बाग हत्याकांड के सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक प्रभावों को सामने लाने के उद्देश्य से गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (GNDU), अमृतसर की Jallianwala Bagh Chair ने एक नई पुस्तक लॉन्च की है। ‘History, Literature, Folklore and the Jallianwala Bagh Massacre’ नामक इस पुस्तक के विमोचन के साथ इतिहास, साहित्य और सामूहिक स्मृति से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा भी आयोजित की गई।
बहुआयामी शोध को सामने लाने की कोशिश
कार्यक्रम का आयोजन Jallianwala Bagh Chair की चेयरपर्सन प्रो. अमनदीप बल की देखरेख में किया गया। उन्होंने चेयर की ओर से किए जा रहे शोध कार्यों और इसके तहत आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी साझा की।
उन्होंने नई पुस्तक को अकादमिक और शोध समुदाय को समर्पित किया। पुस्तक का उद्देश्य जलियांवाला बाग हत्याकांड को केवल एक राजनीतिक घटना के रूप में देखने के बजाय उसके साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभावों को भी समझना है।
पुस्तक में 16 बहुभाषी निबंध शामिल
‘History, Literature, Folklore and the Jallianwala Bagh Massacre’ में जलियांवाला बाग हत्याकांड से संबंधित साहित्य पर आधारित 16 बहुभाषी निबंध शामिल किए गए हैं।
इन लेखों में अलग-अलग भाषाओं और साहित्यिक परंपराओं के माध्यम से इस ऐतिहासिक घटना की व्याख्या की गई है। पुस्तक में पुराने और समकालीन दोनों दौर के लेखकों की रचनाओं को शामिल किया गया है।
इनमें सआदत हसन मंटो, सुभद्रा कुमारी चौहान और कृष्ण चंदर जैसे चर्चित साहित्यकारों के साथ-साथ नवतेज सरना और राजवती मान जैसे समकालीन लेखकों के कार्यों का भी विश्लेषण किया गया है।
साहित्य में दर्ज हुआ जलियांवाला बाग का दर्द
पुस्तक में जलियांवाला बाग हत्याकांड के प्रभाव को कविताओं, लेखों और अन्य साहित्यिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से समझने का प्रयास किया गया है।
कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने बताया कि साहित्य ने इस घटना से जुड़े दर्द, स्मृति और प्रतिरोध को पीढ़ियों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लोकप्रिय कविताओं और गीतों में जलियांवाला बाग की स्मृति किस तरह दिखाई देती है, इसका भी पुस्तक में अध्ययन किया गया है।
नवदीप सिंह सूरी ने साझा किया पारिवारिक संबंध
पुस्तक विमोचन और चर्चा में पूर्व राजनयिक एवं लेखक- अनुवादक नवदीप सिंह सूरी भी शामिल हुए। उन्होंने BBC के दक्षिण एशिया संवाददाता जस्टिन रॉलट के साथ हुई अपनी बातचीत का उल्लेख किया।
रॉलट, उस समय के अधिकारी सर सिडनी रॉलट के परपोते हैं, जिनसे जुड़े रॉलट एक्ट ने 1919 में व्यापक राजनीतिक असंतोष पैदा किया था। सूरी ने अपने परिवार का जलियांवाला बाग की घटना से जुड़ा संबंध भी साझा किया।
उन्होंने बताया कि उनके दादा और प्रसिद्ध उपन्यासकार नानक सिंह जलियांवाला बाग हत्याकांड के प्रत्यक्षदर्शियों में शामिल थे और बाद में उन्होंने उस घटना की भयावहता पर आधारित ‘खूनी वैशाखी’ लिखी थी।
‘खूनी वैशाखी’ की कहानी भी चर्चा में
नवदीप सिंह सूरी ने अपने परिवार द्वारा नानक सिंह की प्रतिबंधित कविता ‘खूनी वैशाखी’ को दोबारा खोजे जाने की कहानी भी साझा की। उन्होंने कहा कि ऐसे संवाद इतिहास और सामूहिक स्मृति को नए नजरिए से देखने में मदद कर सकते हैं।
‘खूनी वैशाखी’ जलियांवाला बाग की घटना से जुड़ी महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों में गिनी जाती है और यह उस समय देखी गई हिंसा और उसके प्रभाव को साहित्य के माध्यम से सामने लाती है।
विशेषज्ञों ने पुस्तक की समीक्षा की
कार्यक्रम में प्रो. हरिश शर्मा और प्रो. सुखदेव सिंह सोहल ने भी पुस्तक में शामिल सामग्री की समीक्षा की।
प्रो. हरिश शर्मा ने पुस्तक में शामिल अंग्रेजी और हिंदी साहित्य से जुड़े लेखों पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि इन लेखों के जरिए जलियांवाला बाग हत्याकांड को अलग-अलग साहित्यिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से समझने का अवसर मिलता है।
वहीं, प्रो. सुखदेव सिंह सोहल ने पुस्तक में शामिल पंजाबी और उर्दू साहित्य की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि यह काम हत्याकांड और सत्ता, राजनीति तथा लोगों की धारणाओं के बीच संबंध को समझने के लिए नए दृष्टिकोण उपलब्ध कराता है।
Jallianwala Bagh Chair का शोध कार्य
GNDU में Jallianwala Bagh Chair की स्थापना 2022 में जलियांवाला बाग हत्याकांड की शताब्दी स्मृति और घटना में मारे गए निर्दोष भारतीयों के सम्मान के उद्देश्य से की गई थी। इसका प्रमुख उद्देश्य स्वतंत्रता संग्राम के व्यापक संदर्भ में जलियांवाला बाग हत्याकांड पर शोध करना है।
चेयर ने पंजाब सरकार की एक परियोजना के तहत हत्याकांड के पीड़ितों की पहचान और सत्यापन पर भी काम किया है। इसके शोध कार्य को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया है और इसके अलावा कई शोध लेख तथा राष्ट्रीय स्तर के सेमिनार भी आयोजित किए गए हैं।
इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की पहल
नई पुस्तक का विमोचन इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा सकता है कि जलियांवाला बाग हत्याकांड को केवल इतिहास की किताबों तक सीमित न रखा जाए। साहित्य, लोक स्मृति और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के जरिए इस घटना को समझने से इसके मानवीय और सामाजिक प्रभावों को भी सामने लाया जा सकता है।
ऐसे शोध और अकादमिक कार्यक्रम युवाओं और नई पीढ़ी को 1919 की इस ऐतिहासिक घटना के विभिन्न पहलुओं से परिचित कराने में मदद कर सकते हैं।
