25 मई 2026 : जानी चोर नामक प्रसिद्ध हरियाणवी सांग ने अपने 25 वर्ष पूरे कर लिए हैं। लोक संस्कृति और रंगमंच की दुनिया में इस प्रस्तुति को एक विशेष पहचान मिली है। खास बात यह है कि इसकी शुरुआत हिसार जेल से हुई थी और आज यह देश-विदेश तक अपनी पहचान बना चुका है।
जानकारी के अनुसार, “जानी चोर” हरियाणवी लोकनाट्य परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इस सांग ने ग्रामीण संस्कृति, लोकभाषा और पारंपरिक कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई है।
सूत्रों के मुताबिक, शुरुआती दौर में इस प्रस्तुति का मंचन सीमित स्तर पर हुआ था, लेकिन धीरे-धीरे इसकी लोकप्रियता बढ़ती गई। बाद में इसे विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी प्रस्तुत किया गया।
हरियाणा की लोक संस्कृति में “सांग” परंपरा का विशेष महत्व माना जाता है। यह लोकनाट्य शैली मनोरंजन के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश देने का माध्यम भी रही है।
लोककला विशेषज्ञों का कहना है कि “जानी चोर” की सफलता का मुख्य कारण इसकी लोकभाषा, भावनात्मक प्रस्तुति और पारंपरिक संगीत शैली है, जिसने लोगों से गहरा जुड़ाव बनाया।
भारत में लोककलाओं को संरक्षित रखने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं, क्योंकि आधुनिक मनोरंजन माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के बीच पारंपरिक कलाओं को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, लोकनाट्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि सामाजिक इतिहास और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण दस्तावेज भी होते हैं।
“जानी चोर” से जुड़े कलाकारों और सांस्कृतिक संगठनों ने इस 25 वर्षीय यात्रा को हरियाणवी संस्कृति की बड़ी उपलब्धि बताया है। उनका कहना है कि इस प्रस्तुति ने ग्रामीण कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में मदद की।
हिसार से शुरू हुई यह सांस्कृतिक यात्रा अब हरियाणा की लोककला की पहचान बन चुकी है।
फिलहाल, इस उपलब्धि के अवसर पर विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रमों और प्रस्तुतियों की तैयारी की जा रही है। कला प्रेमियों और सांस्कृतिक संगठनों के बीच इसे लेकर उत्साह देखा जा रहा है।
यह घटनाक्रम यह दर्शाता है कि लोककला और पारंपरिक रंगमंच आज भी समाज और संस्कृति से गहरा जुड़ाव बनाए हुए हैं और नई पीढ़ी तक अपनी विरासत पहुंचा रहे हैं।
