4 मई 2026 : भारतीय संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर एक अहम बहस फिर से तेज हो गई है। सवाल यह उठ रहा है कि संसद की सबसे प्रभावशाली समितियों में से एक की अध्यक्षता अब तक किसी महिला को क्यों नहीं सौंपी गई।
यह चर्चा खासतौर पर लोक लेखा समिति (PAC) को लेकर हो रही है, जिसे संसद की सबसे महत्वपूर्ण समितियों में गिना जाता है। यह समिति सरकारी खर्च, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों और वित्तीय पारदर्शिता की जांच करती है, इसलिए इसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में संसद में महिला सांसदों की संख्या बढ़ी है, लेकिन निर्णय लेने वाले अहम पदों पर उनकी हिस्सेदारी अभी भी सीमित है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या महिलाओं को पर्याप्त अवसर दिए जा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विविधता और संतुलन जरूरी होता है। यदि महिलाओं को प्रमुख समितियों की जिम्मेदारी दी जाती है, तो नीति निर्माण में अलग दृष्टिकोण और संवेदनशीलता जुड़ सकती है।
हालांकि, कुछ नेताओं का मानना है कि समितियों के अध्यक्ष का चयन अनुभव, वरिष्ठता और राजनीतिक समीकरणों के आधार पर किया जाता है, न कि लिंग के आधार पर। लेकिन इस तर्क पर भी सवाल उठ रहे हैं कि यदि महिलाओं को अवसर ही कम मिलेंगे, तो वे अनुभव कैसे हासिल करेंगी।
भारतीय संसद की छवि एक समावेशी संस्था की रही है, लेकिन इस मुद्दे ने यह दिखाया है कि अभी भी लैंगिक समानता की दिशा में काफी काम किया जाना बाकी है।
महिला नेताओं और सामाजिक संगठनों का कहना है कि अब समय आ गया है कि महिलाओं को भी इस तरह की अहम जिम्मेदारियां सौंपी जाएं। इससे न केवल महिलाओं का मनोबल बढ़ेगा, बल्कि लोकतंत्र भी अधिक मजबूत और प्रतिनिधिक बनेगा।
इस मुद्दे ने राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा को जन्म दिया है। कई लोग इसे सुधार का अवसर मान रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि आने वाले समय में इस दिशा में सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा।
फिलहाल, यह सवाल बना हुआ है कि आखिर कब संसद की सबसे महत्वपूर्ण समिति की कमान किसी महिला को सौंपी जाएगी। यह केवल एक पद का मामला नहीं है, बल्कि समान अवसर और प्रतिनिधित्व का मुद्दा है।
यह बहस यह दर्शाती है कि लोकतंत्र में सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करना कितना जरूरी है, खासकर जब बात नीति निर्माण और निर्णय लेने की हो।
