27 अगस्त 2026: हिमालय की कला और संस्कृति में चंबा रुमाल एक ऐसी पारंपरिक कढ़ाई है, जिसमें कपड़े पर धागों के जरिए कहानियां और चित्र उकेरे जाते हैं। अमृतसर के KT Kala Museum and Art Gallery में आयोजित एक विशेष कार्यशाला में इस अनोखी कला को छात्रों और कला प्रेमियों के सामने प्रदर्शित किया गया।
डबल स्टिच तकनीक ने मोहा मन
कार्यशाला में कलाकार और क्राफ्ट रिसर्चर रीना देवी ने छात्रों को चंबा रुमाल की प्रसिद्ध दोरुखा (डबल स्टिच) तकनीक का प्रदर्शन किया। इस तकनीक की खासियत यह है कि कढ़ाई कपड़े के दोनों तरफ एक साथ की जाती है और दोनों तरफ लगभग एक जैसी आकृति दिखाई देती है।
इस वजह से चंबा रुमाल देखने में किसी बारीक मिनिएचर पेंटिंग जैसा नजर आता है।
हिमाचल प्रदेश से जुड़ी है कला
चंबा रुमाल की पारंपरिक कढ़ाई की उत्पत्ति हिमाचल प्रदेश से मानी जाती है। इसकी बारीक कारीगरी और विशिष्ट तकनीक के कारण इसे भौगोलिक संकेतक (GI) से संरक्षित पारंपरिक वस्त्र कला का दर्जा प्राप्त है।
इस कला में प्राकृतिक रेशों से बने धागों और जैविक रंगों के इस्तेमाल पर भी जोर दिया जाता है। इसे एक तरह की जीरो-वेस्ट कला के रूप में भी प्रस्तुत किया गया, क्योंकि इसमें सामग्री का उपयोग बेहद सोच-समझकर किया जाता है।
पंजाब से भी गहरा सांस्कृतिक रिश्ता
चंबा रुमाल का पंजाब से भी एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंध बताया जाता है। मान्यता है कि गुरु नानक देव जी की बहन बीबी नानकी द्वारा 16वीं शताब्दी में तैयार किया गया सबसे पुराना दर्ज चंबा रुमाल होशियारपुर के गुरुद्वारा बाबा दे बेर में संरक्षित है।
एक कपड़े पर उभरती है पूरी कहानी
चंबा रुमाल की खासियत सिर्फ इसकी सुंदरता नहीं, बल्कि इसकी कहानी कहने की क्षमता भी है। कढ़ाई के जरिए कपड़े पर धार्मिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक दृश्यों को बेहद बारीकी से उकेरा जाता है।
डोरुखा तकनीक में बिना गांठ दिखाई दिए दोनों तरफ समान डिजाइन तैयार करना कारीगर के लिए बेहद सटीक योजना और कौशल की मांग करता है।
नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी
कार्यशाला में 70 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। आयोजकों और कला विशेषज्ञों ने कहा कि पारंपरिक कलाओं को जीवित रखने के लिए अनुभवी कलाकारों और कारीगरों को अपनी तकनीक नई पीढ़ी तक पहुंचानी होगी।
टिकाऊ फैशन से जोड़ने की कोशिश
रीना देवी पारंपरिक कढ़ाई को केवल संरक्षित करने के बजाय इसे आधुनिक सस्टेनेबल और स्लो फैशन से जोड़ने पर भी काम कर रही हैं। उनका प्रयास है कि पुरानी तकनीक को नए बाजार और नई पीढ़ी से जोड़ा जाए, ताकि यह कला आने वाले समय में भी जीवित रह सके।
कुल मिलाकर, चंबा रुमाल हिमालयी विरासत की ऐसी अनोखी कला है, जिसमें धागों के जरिए इतिहास, संस्कृति और परंपरा को कपड़े पर जीवंत किया जाता है। अमृतसर में आयोजित कार्यशाला ने इस कला की बारीकियों को नई पीढ़ी के सामने रखने के साथ-साथ इसके संरक्षण की जरूरत को भी रेखांकित किया।
