28 सितंबर 2026 पंजाब में पराली जलाने की समस्या के बीच अमृतसर के उडोवाली गांव के किसान सुखबीर सिंह ने खेती का अलग रास्ता अपनाया है। वह अपनी करीब 30 एकड़ जमीन पर न तो फसल अवशेष जलाते हैं और न ही रासायनिक आधारित कृषि इनपुट का इस्तेमाल करते हैं। किसान का कहना है कि इस बदलाव का उद्देश्य खेती की लागत कम करने के साथ-साथ मिट्टी और पर्यावरण की सेहत को बेहतर बनाए रखना है।
सात साल पहले शुरू किया खेती में बदलाव
सुखबीर सिंह ने करीब सात साल पहले अपनी पारंपरिक खेती के तरीके में बदलाव करना शुरू किया। इस दौरान उनका संपर्क Young Innovative Farmers Group और Progressive Farmers Network से जुड़े किसानों से हुआ। इन किसानों के अनुभवों से प्रेरित होकर उन्होंने टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल खेती के तरीकों को अपनाने की कोशिश शुरू की।
हालांकि यह बदलाव अचानक नहीं हुआ। किसान के मुताबिक, पारंपरिक खेती की लंबे समय से चली आ रही आदतों को बदलने के लिए उन्होंने दूसरे किसानों से सीखा और धीरे-धीरे अपने खेत में नए तरीकों को अपनाया।
छह साल से नहीं जलाई धान और गेहूं की पराली
सुखबीर सिंह के अनुसार, उन्होंने पिछले छह वर्षों से धान की पराली और गेहूं के अवशेष नहीं जलाए हैं। इसके बजाय वह फसल अवशेषों को खेत की मिट्टी में ही मिला देते हैं, जिससे वे समय के साथ सड़कर मिट्टी का हिस्सा बन जाते हैं।
हाल ही में धान की कटाई के बाद उन्होंने खेत में पानी भरकर पडलिंग की। इस प्रक्रिया के दौरान धान की पराली को मिट्टी में मिला दिया गया। पानी के साथ इसके सड़ने के बाद खेत की जुताई की गई और मिट्टी को धूप तथा हवा मिलने दी गई।
किसान के मुताबिक, इस प्रक्रिया के बाद खेत अब आलू की खेती के लिए तैयार है। उन्होंने बताया कि अवशेषों के मिट्टी में मिलकर सड़ने के बाद मिट्टी के रंग और बनावट में भी बदलाव देखा जा सकता है।
गेहूं, धान से लेकर मक्का और आलू तक खेती
सुखबीर सिंह अपने खेत में कई तरह की फसलें उगाते हैं। इनमें गेहूं, धान, मक्का, आलू और मटर शामिल हैं। उन्होंने धीरे-धीरे रासायनिक खेती पर निर्भरता कम की है और रासायनिक कीटनाशकों तथा अन्य हानिकारक कृषि इनपुट के स्थान पर जैविक और माइक्रोबियल आधारित समाधान अपनाने शुरू किए हैं।
इन स्थानीय माइक्रोबियल आधारित समाधानों का इस्तेमाल मिट्टी की सेहत सुधारने, फसल की उत्पादकता और गुणवत्ता बनाए रखने तथा कीट और फसल अवशेष प्रबंधन में किया जाता है।
खेती की लागत कम करना भी रहा उद्देश्य
सुखबीर सिंह के अनुसार, खेती के तरीके में बदलाव के पीछे एक प्रमुख कारण इनपुट लागत को कम करना भी है। उनका मानना है कि रासायनिक उत्पादों पर अधिक निर्भरता से किसानों का खर्च बढ़ता है।
उन्होंने कहा कि कई किसान जानकारी के अभाव में फसल अवशेष जला देते हैं और रासायनिक उत्पादों का अधिक इस्तेमाल करते हैं। इससे एक तरफ किसानों की लागत बढ़ती है, वहीं दूसरी तरफ मिट्टी और पर्यावरण पर भी असर पड़ता है।
जैविक तरीकों को बताया कम खर्चीला विकल्प
सुखबीर सिंह का कहना है कि जैविक तरीकों को सही तरीके से अपनाया जाए तो वे तुलनात्मक रूप से कम खर्चीले हो सकते हैं और जरूरी नहीं कि इससे फसल की पैदावार प्रभावित हो। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे तरीकों को अपनाने के लिए किसानों को अपनी पारंपरिक खेती की प्रक्रियाओं में बदलाव करना पड़ता है।
उनके लिए यह बदलाव केवल पराली जलाने से बचने तक सीमित नहीं है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता और खेती की लंबी अवधि की स्थिरता पर भी ध्यान देने का प्रयास है।
दूसरे किसानों से सीखकर अपनाया नया तरीका
सुखबीर सिंह ने बताया कि पर्यावरण अनुकूल खेती की दिशा में बढ़ने में दूसरे प्रगतिशील किसानों से मिले अनुभवों की भी भूमिका रही। खास तौर पर किसान गुरबिंदर सिंह बाजवा के साथ बातचीत के बाद उन्होंने रासायनिक खेती से दूरी बनाने की दिशा में और कदम उठाए।
उनका अनुभव बताता है कि किसानों के बीच जानकारी और व्यावहारिक अनुभव साझा करने से खेती के नए तरीकों को अपनाने में मदद मिल सकती है।
पराली प्रबंधन की दिशा में उदाहरण
पंजाब में हर साल धान की कटाई के बाद फसल अवशेष प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बना रहता है। ऐसे समय में सुखबीर सिंह का अपनी 30 एकड़ जमीन पर पराली न जलाने का तरीका खेती में वैकल्पिक उपायों की संभावनाओं को सामने रखता है।
फसल अवशेषों को खेत में ही मिलाकर मिट्टी में सड़ने देना पराली जलाने के बजाय अपनाया गया उनका तरीका है। इससे वह खेत की मिट्टी को फसल अवशेषों के साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
किसानों के लिए संदेश
सुखबीर सिंह का मानना है कि किसानों को पराली जलाने और रासायनिक खेती के विकल्पों के बारे में अधिक जानकारी मिलनी चाहिए। उनका अनुभव है कि सही जानकारी और दूसरे किसानों से सीख के जरिए खेती के तरीकों में धीरे-धीरे बदलाव किया जा सकता है।
उनका 30 एकड़ का खेत इस बात का उदाहरण है कि फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उन्हें मिट्टी में मिलाकर और रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम करके खेती करने का प्रयास किया जा सकता है।
