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उम्रकैद के दोषियों को सुधार का मौका मिले, सजा को बदले का जरिया न बनाएं: हाईकोर्ट

2 नवंबर 2026 :    पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा काट रहे दोषियों की समय से पहले रिहाई के मामलों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि सजा का उद्देश्य बदला लेना नहीं, बल्कि अपराधी को सुधारकर समाज में दोबारा शामिल होने का अवसर देना होना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को उसके अपराध से अलग करके भी देखा जाना चाहिए और समय से पहले रिहाई पर फैसला लेते समय उसके जेल में व्यवहार, मानसिक स्थिति, सामाजिक पृष्ठभूमि और पैरोल के दौरान आचरण को ध्यान में रखना जरूरी है।

जस्टिस सुमीत गोयल ने यह टिप्पणी एक दोषी की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। अदालत ने उसकी समय से पहले रिहाई की मांग को एक साल के लिए टालने वाले आदेश को रद्द कर दिया और संबंधित अधिकारियों को मामले पर लागू सरकारी नीति और कानून के अनुसार दोबारा विचार करने का निर्देश दिया।

अपराधी और अपराध में अंतर करना जरूरी

हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था को अपराध करने वाले व्यक्ति और उसके द्वारा किए गए अपराध के बीच अंतर समझना चाहिए। अदालत के अनुसार, किसी व्यक्ति से अपराध होने के बाद भी उसके सुधार और समाज में जिम्मेदार नागरिक के रूप में लौटने की संभावना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।

जस्टिस गोयल ने कहा कि अपराध से मुक्त समाज की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है, लेकिन कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी है कि वह अपराधियों के पुनर्वास का प्रयास करे। जेलों को केवल सजा देने की जगह नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास के केंद्र के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

अदालत ने यह भी चेताया कि सजा का निवारक उद्देश्य अत्यधिक प्रतिशोध का रूप नहीं लेना चाहिए। उम्रकैद की सजा काट रहे व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता बेहद महत्वपूर्ण है और यह मानकर नहीं चला जा सकता कि रिहा होने वाला हर दोषी अपने खिलाफ गवाही देने वालों या शिकायतकर्ताओं से बदला लेने लगेगा।

समय से पहले रिहाई के फैसले में किन बातों पर ध्यान देना होगा?

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी उम्रकैद के दोषी की समय से पहले रिहाई पर विचार करते समय केवल अपराध की गंभीरता को आधार नहीं बनाया जा सकता। अधिकारियों को उसके पूरे मामले और मौजूदा परिस्थितियों का आकलन करना होगा।

अदालत ने जिन प्रमुख पहलुओं पर ध्यान देने की बात कही, उनमें जेल में दोषी का व्यवहार, अपराध के समय उसकी मानसिक स्थिति, सामाजिक पृष्ठभूमि, अपराध की गंभीरता और पैरोल पर बाहर रहने के दौरान उसका आचरण शामिल हैं।

इन पहलुओं के आधार पर यह समझने में मदद मिल सकती है कि दोषी के व्यवहार में कितना बदलाव आया है और समाज में लौटने के बाद उसके दोबारा अपराध करने की आशंका कितनी है।

तीन सह-दोषियों को मिल चुकी थी रिहाई

यह मामला पानीपत की अदालत में दर्ज एक घर में जबरन प्रवेश से जुड़े अपराध का है। याचिकाकर्ता को भारतीय दंड संहिता की धारा 460 और 34 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि इस मामले में दोषी ठहराए गए उसके तीन सह-आरोपियों को पहले ही समय से पहले रिहाई मिल चुकी है, जबकि उसकी स्थिति भी उनके समान है।

राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए अपराध को गंभीर बताया। हालांकि, अदालत ने रिकॉर्ड किया कि सरकारी पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि याचिकाकर्ता लागू सरकारी नीति में निर्धारित शर्तों को पूरा नहीं करता।

समान स्थिति वाले दोषियों के साथ भेदभाव नहीं हो सकता

हाईकोर्ट ने कहा कि समय से पहले रिहाई से जुड़ी सरकारी नीति को सभी पात्र दोषियों पर निष्पक्ष और समान रूप से लागू किया जाना चाहिए। सरकार समान परिस्थितियों वाले कुछ दोषियों को राहत देकर दूसरे को बिना उचित कारण इससे वंचित नहीं कर सकती।

अदालत के अनुसार, ऐसे फैसलों का संबंध संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मिलने वाले अधिकारों से भी है। अधिकारियों को रिहाई की मांग पर स्पष्ट कारणों के साथ आदेश देना चाहिए और किसी दोषी को समाज के लिए खतरा बताने या उसकी रिहाई टालने के लिए मनमाना आधार नहीं अपनाना चाहिए।

चार सप्ताह में दोबारा विचार करने का निर्देश

हाईकोर्ट ने 24 अगस्त को जारी उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दोषी की समय से पहले रिहाई की मांग को एक साल के लिए टाल दिया गया था। अदालत ने सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के चार सप्ताह के भीतर लागू नीति और कानून के अनुसार मामले पर दोबारा विचार करे।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके निर्देशों या सरकारी नीति से किसी तरह का विचलन होने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 215 के तहत अवमानना की कार्यवाही की मांग की जा सकती है।

हाईकोर्ट की इस टिप्पणी का अर्थ यह नहीं है कि हर उम्रकैद का दोषी समय से पहले रिहाई पाने का हकदार है। अदालत ने मुख्य रूप से यह स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों में निर्णय निष्पक्ष, व्यक्तिगत परिस्थितियों पर आधारित और लागू नियमों के अनुरूप होना चाहिए।

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