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पराली जलाने के बजाय नाशपाती के बागों में करें इस्तेमाल, PAU विशेषज्ञों ने किसानों को बताए मिट्टी और फसल के फायदे

30 अक्तूबर 2026:   पंजाब में धान की कटाई के बाद बचने वाली पराली के बेहतर प्रबंधन को लेकर पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के विशेषज्ञों ने किसानों को एक उपयोगी विकल्प सुझाया है। विशेषज्ञों ने नाशपाती के बागों में धान की पराली को मल्चिंग के रूप में इस्तेमाल करने की सलाह दी है। इससे मिट्टी में नमी बनाए रखने, खरपतवार नियंत्रित करने और फलों की गुणवत्ता सुधारने में मदद मिल सकती है।

यह सलाह बुधवार को अमृतसर के वेरका स्थित पियर एस्टेट में आयोजित किसान-वैज्ञानिक संवाद और तकनीकी कार्यक्रम के दौरान दी गई। कार्यक्रम का आयोजन पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के फार्म एडवाइजरी सर्विस सेंटर की ओर से किया गया था। इसमें फल उत्पादकों को नाशपाती की वैज्ञानिक खेती और बागों की बेहतर देखभाल के तरीकों की जानकारी दी गई।

पराली से मिट्टी की नमी बचाने में मिलेगी मदद

PAU की वरिष्ठ विस्तार वैज्ञानिक (फल) डॉ. स्वारित खैरा ने किसानों को नाशपाती के बागों में धान की पराली से मल्चिंग करने के फायदे बताए। उन्होंने समझाया कि पेड़ों के आसपास पराली की परत बिछाने से मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रह सकती है। इससे सिंचाई की जरूरत कम करने और खरपतवार की वृद्धि नियंत्रित करने में सहायता मिलती है।

मल्चिंग से मिट्टी का तापमान संतुलित रखने और मिट्टी की सेहत बेहतर बनाने में भी मदद मिल सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, पराली का इस तरह इस्तेमाल करने से किसानों को फसल अवशेष जलाने के बजाय उसका उपयोगी विकल्प मिल सकता है।

छंटाई और सिंचाई प्रबंधन पर भी जोर

कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने नाशपाती के पेड़ों की उचित छंटाई, खरपतवार नियंत्रण और खाद प्रबंधन पर भी चर्चा की। किसानों को सिंचाई का सही समय और उर्वरकों का संतुलित इस्तेमाल करने की सलाह दी गई।

विशेषज्ञों ने कहा कि बागों में वैज्ञानिक तरीके अपनाने से पौधों की वृद्धि और फल उत्पादन में सुधार किया जा सकता है। समय पर देखभाल और सही प्रबंधन से फल की गुणवत्ता बनाए रखने में भी मदद मिलती है।

बाजार और फसल रिकॉर्ड रखना भी जरूरी

जिला विस्तार विशेषज्ञ और केंद्र प्रमुख डॉ. नरेंद्र पाल सिंह ने किसानों को बेहतर विपणन व्यवस्था अपनाने और खेती से जुड़े रिकॉर्ड नियमित रूप से रखने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि उत्पादन के साथ-साथ बाजार की मांग और बिक्री की योजना बनाना भी फल उत्पादकों के लिए महत्वपूर्ण है।

डॉ. गुरमीत सिंह ने फलदार पौधों में लगने वाले कीटों, बीमारियों और उनके प्रबंधन के बारे में जानकारी दी। वहीं, बागवानी विशेषज्ञ सुखपाल सिंह और तेजबीर सिंह तथा जतिंदर सिंह संधू ने किसानों को नए बाग लगाने और पुराने बागों के कायाकल्प के लिए उपलब्ध सरकारी योजनाओं और सब्सिडी के बारे में बताया।

नाशपाती की खेती का क्षेत्र बढ़ाने की अपील

विशेषज्ञों ने किसानों को नाशपाती की खेती का रकबा बढ़ाने और फलों की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने बताया कि बेहतर किस्मों, वैज्ञानिक तकनीकों और उचित देखभाल के जरिए बागवानी से होने वाली आय में सुधार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

कृषि विज्ञान केंद्र के एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. बिक्रमजीत सिंह गिल ने किसानों से PAU की सिफारिशों के अनुसार खेती करने की अपील की। उन्होंने बागों में अंतरवर्ती फसलों की खेती, सही समय पर फलों की तुड़ाई और उचित पैकेजिंग के महत्व पर भी प्रकाश डाला।

किसानों की समस्याओं का भी किया समाधान

कार्यक्रम में किसानों ने नाशपाती की खेती के दौरान आने वाली समस्याएं विशेषज्ञों के सामने रखीं। वैज्ञानिकों ने उनकी समस्याएं सुनीं और परिस्थितियों के अनुसार समाधान सुझाए।

विशेषज्ञों का कहना है कि धान की पराली को जलाने के बजाय बागों में मल्चिंग के रूप में इस्तेमाल करना किसानों के लिए उपयोगी हो सकता है। इससे पराली का बेहतर उपयोग होने के साथ मिट्टी की सेहत और फल उत्पादन को भी लाभ मिल सकता है।

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