18 अक्तूबर 2026: पंजाब के अमृतसर में नवरात्र और दशहरे के दौरान मोहल्लों में आयोजित होने वाली पारंपरिक रामलीला की रौनक धीरे-धीरे कम होती दिखाई दे रही है। कभी शहर के अलग-अलग इलाकों में अस्थायी मंच सजते थे, कलाकार रामायण के प्रसंगों का मंचन करते थे और स्थानीय लोग परिवारों के साथ शाम को रामलीला देखने पहुंचते थे। लेकिन अब कई स्थानों पर यह परंपरा सिमट गई है। मंचों की संख्या घटने और दर्शकों की कम होती भागीदारी ने स्थानीय रामलीला समितियों के सामने चुनौती खड़ी कर दी है।
रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों को जोड़ने वाली सांस्कृतिक परंपरा भी रही है। इसमें मोहल्ले के लोग मिलकर मंच तैयार करते, बैठने की व्यवस्था संभालते, कलाकारों के लिए वेशभूषा जुटाते और आयोजन के खर्च के लिए चंदा इकट्ठा करते थे। स्थानीय कलाकार भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण, हनुमान और रावण सहित विभिन्न पात्रों की भूमिका निभाते थे। इस तरह एक ही आयोजन में कई पीढ़ियों के लोग शामिल होते थे। अब कई इलाकों में पहले जैसी भागीदारी नहीं रह गई है।
कई इलाकों में सिमट गए रामलीला के मंच
अमृतसर के पश्चिमी हिस्से में पुतलीघर, कोट खालसा, भल्ला कॉलोनी, खंडवाला, छेहरटा और नारायणगढ़ जैसे इलाकों में पहले रामलीला के आयोजन होते थे। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, इन क्षेत्रों में अब केवल चार सक्रिय रामलीला समूह बचे हैं। यह बदलाव बताता है कि स्थानीय स्तर पर इस परंपरा को जारी रखना आयोजकों के लिए कितना मुश्किल होता जा रहा है।
रामलीला के आयोजन के लिए खुले मैदानों की अहम भूमिका रही है। कलाकारों के मंच, दर्शकों के बैठने की जगह और अस्थायी सजावट के लिए पर्याप्त स्थान चाहिए होता है। लेकिन शहरों के विस्तार और जमीन के बदलते इस्तेमाल के कारण ऐसे स्थानों तक पहुंचना आयोजकों के लिए चुनौती बन रहा है। इसके साथ ही अनुमति, सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन से जुड़ी जरूरतें भी आयोजन की योजना को प्रभावित कर सकती हैं।
दर्शकों की कमी बनी बड़ी चुनौती
रामलीला समितियों के सामने केवल मंच तैयार करने की समस्या नहीं है, बल्कि दर्शकों की घटती संख्या भी चिंता का विषय है। पुतलीघर क्षेत्र की रामलीला समिति से जुड़े रहे अशोक कुमार के अनुसार, पहले स्थानीय निवासी आयोजन के लिए आर्थिक सहयोग देते थे और स्वयंसेवक व्यवस्था संभालते थे। अब कई जगहों पर दर्शकों की संख्या बहुत कम रह गई है।
जब किसी आयोजन में लोगों की भागीदारी घटती है, तो उसे नियमित रूप से चलाना कठिन हो जाता है। कलाकारों को जुटाना, मंच और ध्वनि व्यवस्था का खर्च उठाना तथा कई दिनों तक कार्यक्रम आयोजित करना स्थानीय समितियों के लिए चुनौती बन सकता है। परिणामस्वरूप कुछ समूहों ने गतिविधियां बंद कर दी हैं, जबकि अन्य सीमित संसाधनों के साथ परंपरा को जारी रखने की कोशिश कर रहे हैं।
दशहरे के बड़े आयोजनों में अब भी कायम है रौनक
हालांकि मोहल्लों की रामलीला कमजोर पड़ रही है, लेकिन अमृतसर में कुछ बड़े धार्मिक आयोजन अब भी लोगों को आकर्षित करते हैं। खजाना गेट स्थित भद्रकाली मंदिर के पास दशहरा मैदान में भी बड़े स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। दुर्ग्याना मंदिर समिति के आयोजन में बड़ी संख्या में धार्मिक शोभायात्राएं पहुंचती हैं। समिति की अध्यक्ष लक्ष्मी कांता चावला के अनुसार, दशहरे के अवसर पर लगभग 40 धार्मिक शोभायात्राएं दशहरा मैदान में एकत्र होती हैं। श्रद्धालुओं की पारंपरिक वेशभूषा और धार्मिक झांकियां इन आयोजनों को विशेष पहचान देती हैं।
छेहरटा क्षेत्र के नारायणगढ़ स्थित पंच रतन श्री कृष्ण मंदिर में भी रावण दहन का कार्यक्रम लोगों को आकर्षित करता है। ऐसे आयोजन बताते हैं कि शहर में दशहरे की परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, लेकिन इसका स्वरूप बदल रहा है। बड़े आयोजनों के बीच छोटे मोहल्लों की रामलीला को पहले जैसी जगह और दर्शक मिलना मुश्किल हो रहा है।
1955 से चली आ रही परंपरा के सामने नई चुनौतियां
दशहरा आयोजन समिति के सदस्य तरसेम लाल के अनुसार, अमृतसर में कई निर्धारित स्थानों पर रावण दहन की परंपरा 1955 से जारी है। हालांकि, समय के साथ आयोजनों का पैमाना कम हुआ है और दर्शकों की संख्या में भी गिरावट आई है। उनका कहना है कि अब लोग पारंपरिक उत्सवों के बजाय घरों में पार्टियां करने या बाहर घूमने जैसे विकल्प भी चुन रहे हैं।
रामलीला की चुनौती केवल आयोजन स्थलों और भीड़ तक सीमित नहीं है। स्थानीय स्तर पर सामुदायिक सहयोग बनाए रखना, कलाकारों को जोड़ना और नई पीढ़ी की रुचि कायम रखना भी जरूरी है। यदि मोहल्लों के निवासी, स्थानीय संस्थाएं और सांस्कृतिक समूह मिलकर छोटे आयोजनों को सहयोग दें, तो इस परंपरा को नए रूप में आगे बढ़ाने की संभावनाएं बनी रह सकती हैं।
रामलीला रामायण की कथा को अभिनय, संवाद, संगीत और सामूहिक भागीदारी के माध्यम से लोगों तक पहुंचाती है। यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ-साथ स्थानीय संस्कृति और सामाजिक मेलजोल से भी जुड़ी है। अमृतसर में घटते मंच और पतली होती दर्शक कतारें इस बात का संकेत हैं कि बदलते शहरी जीवन के बीच पुरानी परंपराओं को जीवित रखने के लिए सामुदायिक भागीदारी की जरूरत पहले से अधिक हो गई है।
