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दिल्ली कोर्ट ने MCOCA केस में पुलिस को लगाई फटकार, रिपोर्ट को बताया ‘महज दिखावा’

8 अक्टूबर 2026:  दिल्ली की एक अदालत ने संगठित अपराध से जुड़े MCOCA मामले में पुलिस की जांच और आरोपियों की गिरफ्तारी में हुई देरी को लेकर कड़ी नाराजगी जताई है। स्पेशल जज गौरव राव ने दिल्ली पुलिस की ओर से दाखिल रिपोर्ट को “बिल्कुल सतही और महज दिखावा” करार दिया। कोर्ट ने कहा कि जब आरोपियों के खिलाफ महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) जैसे कड़े कानून का इस्तेमाल किया गया था, तो इसके बावजूद वे वर्षों तक बाहर कैसे रहे और इस दौरान गंभीर अपराधों में कथित तौर पर शामिल होते रहे।

सितंबर 2020 में दर्ज हुई थी FIR

मामला सितंबर 2020 में दर्ज एक FIR से जुड़ा है, जिसमें मुकेश उर्फ पुनीत और प्रदीप उर्फ गुरी के खिलाफ MCOCA लगाया गया था। कोर्ट ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि MCOCA लगाए जाने के समय मुकेश के खिलाफ करीब 20 FIR दर्ज थीं। इनमें हत्या के दो मामले और हत्या के प्रयास का एक मामला भी शामिल था।

कोर्ट के अनुसार, इसके बाद भी मुकेश का नाम 2021 से 2024 के बीच दर्ज आठ अन्य FIR में सामने आया। इनमें हत्या, हत्या के प्रयास, लूट और अपहरण जैसे गंभीर आरोपों से जुड़े मामले शामिल थे।

करीब छह साल बाद हुई गिरफ्तारी

अदालत ने कहा कि इन परिस्थितियों के बावजूद मुकेश को 9 फरवरी 2026 को गिरफ्तार किया गया। उसकी गिरफ्तारी ACP राकेश कुमार ने की, जिन्हें 25 सितंबर 2025 को मामले की जांच सौंपी गई थी।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि ACP राकेश कुमार से पहले किसी भी जांच अधिकारी ने आरोपी को गिरफ्तार करने के लिए प्रभावी प्रयास नहीं किए। अदालत ने इस देरी को गंभीरता से लिया और पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।

दूसरे आरोपी की गिरफ्तारी भी काफी देर से

कोर्ट ने दूसरे आरोपी प्रदीप उर्फ गुरी के मामले को भी गंभीर बताया। अदालत के मुताबिक, MCOCA लगाए जाने के बाद भी वह 2020 में कई गंभीर अपराधों में कथित तौर पर शामिल रहा। इसके अलावा उसका नाम 2024 में दर्ज दो FIR में भी आया था।

इसके बावजूद प्रदीप को 16 अप्रैल 2026 को गिरफ्तार किया गया। अदालत ने कहा कि MCOCA लागू होने के बाद आरोपियों की गिरफ्तारी में इतनी लंबी देरी ने कानून के उद्देश्य को ही कमजोर कर दिया।

तीन आरोपी अब भी गिरफ्तार नहीं

अदालत ने यह भी नोट किया कि मामले के तीन अन्य आरोपी—विनोद उर्फ सोनू उर्फ प्रवीण उर्फ खलीफा, प्रदीप उर्फ अनिल उर्फ सलामुद्दीन और विकास उर्फ विक्की उर्फ पंकज—अब तक गिरफ्तार नहीं हुए हैं।

कोर्ट के अनुसार, छह साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद इन आरोपियों के खिलाफ जांच भी पूरी नहीं हुई है। अदालत ने इसे जांच प्रक्रिया में गंभीर देरी माना।

पुलिस की रिपोर्ट पर कोर्ट नाराज

पिछली सुनवाई में अदालत ने पुलिस से पूछा था कि MCOCA लगाए जाने से लेकर गिरफ्तारी तक मुकेश जमानत पर था या न्यायिक हिरासत में। कोर्ट ने अन्य मामलों की जानकारी और संबंधित जांच अधिकारियों से स्पष्टीकरण भी मांगा था।

हालांकि, अदालत के मुताबिक DCP, Outer North District की ओर से दाखिल रिपोर्ट में इन सवालों का उचित जवाब नहीं दिया गया। कोर्ट ने रिपोर्ट को “absolutely perfunctory and mere eyewash” बताते हुए कहा कि इसमें अदालत के सवालों को संबोधित नहीं किया गया।

‘Best efforts’ वाले दावे पर भी सवाल

पुलिस रिपोर्ट में अतिरिक्त DCP की ओर से कहा गया था कि पुलिस अधिकारियों ने मामले में “best efforts” किए हैं और अभी भी प्रयास जारी हैं।

इस पर अदालत ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि यदि यही पुलिस का “best effort” है, तो अदालत के पास कहने के लिए कुछ नहीं है। कोर्ट ने इस तरह के रवैये को गंभीरता से लिया और कहा कि MCOCA जैसे कानून के उद्देश्य को समझना जरूरी है।

कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर को भेजा आदेश

स्पेशल जज गौरव राव ने 5 अक्टूबर के अपने आदेश की एक प्रति दिल्ली पुलिस कमिश्नर को भेजने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि मामले में पुलिस अधिकारियों और जांच अधिकारियों की भूमिका की विस्तृत जांच तथा उचित कार्रवाई की जरूरत है।

अदालत ने पुलिस कमिश्नर के कार्यालय से अगली सुनवाई तक रिपोर्ट भी मांगी है। साथ ही संबंधित ज्वाइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस को अगली तारीख पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर रिपोर्ट और अपनी टिप्पणी पेश करने का निर्देश दिया गया है।

13 अक्टूबर को होगी अगली सुनवाई

अदालत ने मामले की जांच जल्द पूरी करने की उम्मीद जताई है। मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होगी।

कोर्ट की टिप्पणी में यह भी कहा गया कि जांच और चार्जशीट में अत्यधिक देरी से मुकदमे को नुकसान हो सकता है, क्योंकि महत्वपूर्ण सबूत खत्म हो सकते हैं और गवाहों की याददाश्त समय के साथ कमजोर पड़ सकती है। अदालत ने पुलिस की जवाबदेही और समय पर कार्रवाई की जरूरत पर जोर दिया।

कुल मिलाकर, दिल्ली की अदालत ने MCOCA मामले में आरोपियों की गिरफ्तारी में वर्षों की देरी और पुलिस की रिपोर्ट को लेकर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने पुलिस की रिपोर्ट को ‘महज दिखावा’ बताते हुए मामले की विस्तृत जांच और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई की जरूरत बताई है।

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