7 सितंबर 2026 मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के अपहरण और उनके बाद लापता होने की घटना को 31 साल पूरे हो गए हैं। 6 सितंबर 1995 को अमृतसर स्थित उनके घर के बाहर से उनका अपहरण किया गया था। इसके बाद वह कभी जीवित वापस नहीं लौटे। खालड़ा ने पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों, गुमशुदगियों और अज्ञात शवों के गुप्त अंतिम संस्कार के मामलों को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
घर के बाहर से हुआ था अपहरण
6 सितंबर 1995 की सुबह जसवंत सिंह खालड़ा अमृतसर के कबीर पार्क स्थित अपने घर के बाहर कार धो रहे थे। इसी दौरान एक मारुति ओमनी वहां पहुंची और पुलिसकर्मियों की एक टीम उन्हें अपने साथ ले गई। उस समय वहां मौजूद एक प्रत्यक्षदर्शी ने घटना को देखा था।
खालड़ा इसके बाद कभी वापस नहीं आए। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, उन्हें कई सप्ताह तक हिरासत में रखे जाने के बाद अक्टूबर 1995 के अंत में उनकी हत्या कर दी गई। उनका शव बरामद नहीं हो सका और उनके परिवार को आज तक उनके अंतिम अवशेष नहीं मिले।
गुमशुदगियों की जांच से सामने आई बड़ी तस्वीर
खालड़ा मूल रूप से तरनतारन जिले के खालड़ा गांव से थे। उन्होंने बैंकिंग क्षेत्र में काम करने के बाद मानवाधिकारों के मुद्दों पर काम शुरू किया।
अपने दो सहयोगियों के बारे में जानकारी जुटाते हुए उन्हें पंजाब में बड़ी संख्या में लोगों के गायब होने की जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने अमृतसर के तीन श्मशान घाटों के रिकॉर्ड और लकड़ी की खरीद से जुड़े आंकड़ों का मिलान किया।
उनकी जांच में यह आरोप सामने आया कि सुरक्षा बलों द्वारा बड़ी संख्या में अज्ञात या लावारिस शवों का गुप्त रूप से अंतिम संस्कार किया गया था। खालड़ा की जांच में 1984 से 1995 के बीच पंजाब में 25,000 से अधिक लोगों के गायब होने और मारे जाने का अनुमान सामने रखा गया था।
खालड़ा ने अदालत और विदेशों तक पहुंचाई आवाज
जसवंत सिंह खालड़ा ने अपनी जांच से जुड़े दस्तावेज पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाए। उन्होंने भारत के बाहर भी इस मुद्दे को उठाया और कनाडा में भारतीय प्रवासी समुदाय तथा सांसदों के सामने अपनी findings रखीं।
उनकी गतिविधियों के कारण उन्हें धमकियों का भी सामना करना पड़ा। उनके काम का उद्देश्य उन लोगों के बारे में जानकारी सामने लाना था, जिनके परिवार लंबे समय से अपने प्रियजनों की तलाश कर रहे थे।
हत्या के मामले में हुई सजा
खालड़ा की हत्या का मामला वर्षों बाद अदालत तक पहुंचा। नवंबर 2005 में पटियाला की एक अदालत ने पंजाब पुलिस के छह कर्मियों को दोषी ठहराया। डीएसपी जसपाल सिंह और अमरजीत सिंह को हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई, जबकि चार अन्य पुलिसकर्मियों को सात साल की सजा मिली।
हालांकि, खालड़ा द्वारा उठाए गए हजारों गुमशुदगियों और कथित गुप्त अंतिम संस्कारों के बड़े मुद्दे पर अलग स्तर पर वैसी न्यायिक प्रक्रिया नहीं हो सकी जैसी उनके हत्या के मामले में हुई।
‘सतलुज’ ने फिर जिंदा की खालड़ा की कहानी
कई वर्षों तक जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी मुख्य रूप से मानवाधिकार रिपोर्टों, अदालत के दस्तावेजों और पंजाब के लोगों की स्मृतियों तक सीमित रही। लेकिन फिल्म ‘सतलुज’ ने उनकी कहानी को एक बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाया।
फिल्म का निर्देशन हनी त्रेहान ने किया है और इसमें दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका निभाई है। फिल्म को पहले ‘पंजाब 95’ नाम से बनाया गया था। सेंसर बोर्ड से जुड़े विवादों के कारण फिल्म की रिलीज लंबे समय तक अटकी रही और बाद में इसका नाम ‘सतलुज’ रखा गया।
OTT पर रिलीज के बाद फिर शुरू हुआ विवाद
‘सतलुज’ 3 जुलाई 2026 को ZEE5 पर रिलीज हुई, लेकिन करीब 48 घंटे बाद इसे प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। इसके बाद फिल्म को लेकर देशभर में बहस शुरू हो गई।
फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहान का कहना है कि फिल्म का उद्देश्य जसवंत सिंह खालड़ा के मानवाधिकार कार्य को सामने लाना था। उन्होंने दावा किया कि फिल्म की सार्वजनिक स्क्रीनिंग के दौरान पंजाब और देश के अन्य हिस्सों में बड़ी संख्या में लोग इसे देखने पहुंचे।
पंजाब से बाहर भी पहुंची कहानी
‘सतलुज’ के कारण जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी पंजाब से बाहर भी नए दर्शकों तक पहुंची। निर्देशक हनी त्रेहान के अनुसार, फिल्म की स्क्रीनिंग पंजाब के अलावा जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, हरियाणा, मुंबई, पुणे और विदेशों में भी हुई।
उन्होंने कहा कि फिल्म के जरिए उन लोगों की आवाज सामने आई, जिन्होंने लंबे समय तक अपने परिवारों के दर्द और गुमशुदा लोगों की याद को अपने भीतर रखा।
खालड़ा की पत्नी ने उठाया बड़े न्याय का सवाल
जसवंत सिंह खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर खालड़ा लंबे समय से इस मामले को उठाती रही हैं। हालिया विवाद के बीच उन्होंने अकाल तख्त के जत्थेदार से एक पीपुल्स कमीशन बनाने की अपील की है, ताकि पंजाब में हुई गुमशुदगियों और कथित फर्जी मुठभेड़ों की वास्तविक संख्या और स्थिति सामने लाई जा सके।
उनका तर्क है कि केवल जसवंत सिंह खालड़ा की हत्या के मामले में न्यायिक प्रक्रिया पूरी होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन हजारों परिवारों के सवालों का जवाब भी सामने आना चाहिए जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया।
31 साल बाद भी क्यों महत्वपूर्ण है खालड़ा की कहानी?
जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी सिर्फ एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के अपहरण और हत्या की कहानी नहीं है। यह उन सवालों से भी जुड़ी है जो पंजाब के हिंसा और उथल-पुथल से भरे दौर में गुमशुदा हुए लोगों, उनके परिवारों और न्याय की प्रक्रिया को लेकर आज भी मौजूद हैं।
‘सतलुज’ ने इस इतिहास को नई पीढ़ी और व्यापक दर्शक वर्ग के सामने रखने का काम किया है। फिल्म को लेकर विवाद ने भी खालड़ा के काम, उनके द्वारा उठाए गए सवालों और पंजाब के उस दौर की घटनाओं पर फिर से सार्वजनिक चर्चा शुरू कर दी है।
