5 सितंबर 2026 खालसा यूनिवर्सिटी अमृतसर के स्कूल ऑफ लॉ की ओर से सिंगल-यूज़ प्लास्टिक से बढ़ते पर्यावरणीय खतरे को लेकर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। यूनिवर्सिटी ने यह कार्यक्रम पर्यावरण संरक्षण गतिविधि के सहयोग से आयोजित किया, जिसमें सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के विकल्पों, उनसे जुड़ी चुनौतियों और संभावित अवसरों पर चर्चा की गई।
कार्यक्रम का उद्देश्य छात्रों और उपस्थित लोगों को प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या के प्रति जागरूक करना और रोजमर्रा की जिंदगी में प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करने के लिए टिकाऊ विकल्पों को बढ़ावा देना था।
सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर आयोजित हुआ विशेष व्याख्यान
खालसा यूनिवर्सिटी में “Single-Use Plastic Substitutes: Innovations, Challenges and Opportunities” विषय पर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम में सिंगल-यूज़ प्लास्टिक से जुड़े पर्यावरणीय, वैज्ञानिक, नियामक और नीतिगत पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई।
वक्ताओं ने बताया कि प्लास्टिक कचरे की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए केवल प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाना ही पर्याप्त नहीं है। इसके साथ-साथ ऐसे विकल्पों को बढ़ावा देना भी जरूरी है, जो पर्यावरण के लिए कम नुकसानदायक हों और लंबे समय तक इस्तेमाल किए जा सकें।
प्रोफेसर आदर्श पाल विग ने दिया मुख्य संबोधन
कार्यक्रम में गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. आदर्श पाल विग ने मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित किया। वह पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पूर्व चेयरमैन भी रह चुके हैं।
उन्होंने सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के कारण पैदा होने वाली पर्यावरणीय चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने प्लास्टिक की खपत कम करने और इसके स्थान पर टिकाऊ विकल्पों को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया।
डॉ. विग ने पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी संस्थाओं की जिम्मेदारी न मानकर समाज के प्रत्येक वर्ग की भागीदारी को जरूरी बताया।
उत्पादन और खपत में जिम्मेदारी जरूरी
कार्यक्रम के दौरान इस बात पर भी जोर दिया गया कि प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के लिए उत्पादन और उपभोग दोनों स्तरों पर जिम्मेदारी जरूरी है।
अगर प्लास्टिक से बने डिस्पोजेबल उत्पादों की मांग कम होती है और उपभोक्ता पर्यावरण अनुकूल विकल्प अपनाते हैं, तो इससे प्लास्टिक कचरे की मात्रा कम करने में मदद मिल सकती है।
वक्ताओं ने जिम्मेदार उत्पादन और खपत के साथ-साथ पर्यावरणीय कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन को भी महत्वपूर्ण बताया।
तकनीकी नवाचार से मिल सकते हैं बेहतर विकल्प
कार्यक्रम में सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के विकल्प विकसित करने में तकनीकी नवाचार की भूमिका पर भी चर्चा हुई। पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों को बड़े स्तर पर उपलब्ध कराने के लिए नई तकनीकों और बेहतर उत्पादन प्रक्रियाओं की जरूरत बताई गई।
ऐसे विकल्पों का विकास महत्वपूर्ण है, क्योंकि लोगों को प्लास्टिक के इस्तेमाल से दूर करने के लिए व्यवहारिक और आसानी से उपलब्ध विकल्प जरूरी हैं।
पर्यावरण संरक्षण में आम लोगों की भागीदारी अहम
पर्यावरण संरक्षण गतिविधि से जुड़े संदीप संहोत्रा ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ जीवनशैली से जुड़े विचार साझा किए।
कार्यक्रम में इस बात पर जोर दिया गया कि प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए सरकार, शैक्षणिक संस्थानों, उद्योगों और आम जनता को मिलकर प्रयास करना होगा।
केवल नीतियां बनाने से प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी, बल्कि लोगों को अपने दैनिक व्यवहार में भी बदलाव लाना होगा।
प्लास्टिक की जगह टिकाऊ विकल्प अपनाने की जरूरत
सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का इस्तेमाल आमतौर पर कम समय के लिए किया जाता है, लेकिन इससे पैदा होने वाला कचरा लंबे समय तक पर्यावरण के लिए चुनौती बना रह सकता है। ऐसे में बार-बार इस्तेमाल किए जा सकने वाले और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को बढ़ावा देना जरूरी माना जा रहा है।
कपड़े के बैग, पुन: इस्तेमाल योग्य कंटेनर और अन्य टिकाऊ विकल्प प्लास्टिक की खपत कम करने की दिशा में उपयोगी हो सकते हैं।
युवाओं को जागरूक करना भी जरूरी
शैक्षणिक संस्थानों में इस तरह के कार्यक्रम आयोजित करने का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य छात्रों को पर्यावरणीय समस्याओं से जोड़ना भी है। युवा पीढ़ी अगर प्लास्टिक के इस्तेमाल को लेकर जागरूक होती है, तो इसका प्रभाव परिवार और समाज तक पहुंच सकता है।
खालसा यूनिवर्सिटी में आयोजित कार्यक्रम के जरिए भी छात्रों और उपस्थित लोगों को प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ जिम्मेदार व्यवहार अपनाने का संदेश दिया गया।
पर्यावरण संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए पर्यावरणीय कानूनों का प्रभावी पालन, जिम्मेदार उत्पादन और उपभोग, तकनीकी नवाचार और आम जनता की भागीदारी जरूरी है।
सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के स्थान पर टिकाऊ विकल्पों को बढ़ावा देने से पर्यावरण पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
