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अमृतसर में मिलिट्री लिटरेचर फेस्टिवल का समापन, पूर्व सैनिकों ने सुनाई 1965 युद्ध की कहानी

2 सितंबर 2026  खालसा कॉलेज अमृतसर में आयोजित दो दिवसीय मिलिट्री लिटरेचर फेस्टिवल का समापन हो गया। खालसा कॉलेज अमृतसर ने खालसा यूनिवर्सिटी के सहयोग से इस कार्यक्रम का आयोजन किया था। फेस्टिवल के अंतिम दिन 1965 के भारत-पाक युद्ध समेत विभिन्न सैन्य संघर्षों पर चर्चा हुई। इस दौरान सैन्य विशेषज्ञों और पूर्व सैनिकों ने विद्यार्थियों के साथ युद्ध के अनुभव साझा किए और पंजाब के सीमावर्ती इलाकों की रणनीतिक भूमिका पर प्रकाश डाला।

1965 के भारत-पाक युद्ध पर हुई विशेष चर्चा

फेस्टिवल के दौरान 1965 के भारत-पाक युद्ध को लेकर विशेष सत्र आयोजित किया गया। इसमें अमृतसर और पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों के सैन्य महत्व पर चर्चा की गई। पूर्व सैनिकों और सैन्य विशेषज्ञों ने बताया कि युद्ध के दौरान सैनिकों के साथ-साथ स्थानीय नागरिकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही थी।

ब्रिगेडियर सतिंदर सिंह, लेफ्टिनेंट जनरल टीएस शेरगिल और लेफ्टिनेंट जनरल जेएस चीमा समेत कई सैन्य दिग्गजों ने विद्यार्थियों से बातचीत की। उन्होंने युद्ध से जुड़े सैन्य अभियानों और उस समय पंजाब के लोगों द्वारा दिखाई गई बहादुरी के बारे में जानकारी दी।

खेमकरण और असल उत्तर की लड़ाई का जिक्र

कार्यक्रम में खेमकरण और असल उत्तर की लड़ाई पर भी विस्तार से चर्चा हुई। सैन्य विशेषज्ञों ने बताया कि 1965 के युद्ध में अमृतसर-खेमकरण सेक्टर का विशेष रणनीतिक महत्व था।

ब्रिगेडियर सतिंदर सिंह ने कहा कि 1965 का युद्ध केवल हथियारों और सैन्य ताकत की कहानी नहीं था। इस युद्ध ने सैनिकों के साहस, देश के प्रति लोगों की एकजुटता और राष्ट्रीय भावना की ताकत को भी सामने रखा।

उन्होंने बताया कि असल उत्तर में भारतीय सेना की रणनीति में स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों और आसपास के नागरिक क्षेत्र का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।

ग्रामीणों और किसानों ने भी निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

ब्रिगेडियर सतिंदर सिंह के अनुसार, युद्ध के दौरान पंजाब के किसानों और ग्रामीणों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई किसानों और ग्रामीणों ने अपने घर और जमीन खाली कर दी, ताकि सेना वहां अपने अभियान को प्रभावी तरीके से संचालित कर सके।

उन्होंने बताया कि प्रशासन ने भी नागरिकों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में मदद की। इससे युद्ध क्षेत्र में आम नागरिकों के लिए खतरा कम करने में सहायता मिली।

सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, पंजाब के खेत, गन्ने की फसल और सिंचाई नहरें भी उस समय भारतीय सेना की रक्षा रणनीति में उपयोगी साबित हुईं।

असल उत्तर की लड़ाई और पटटन टैंकों की हार

लेफ्टिनेंट जनरल टीएस शेरगिल ने असल उत्तर की लड़ाई और भारतीय सैनिकों की बहादुरी को याद किया। यह लड़ाई 1965 के भारत-पाक युद्ध की निर्णायक लड़ाइयों में शामिल थी।

इस दौरान पाकिस्तान की 1st Armoured Division ने बड़ी संख्या में अमेरिकी निर्मित M47 और M48 पैटन टैंकों के साथ खेमकरण क्षेत्र में आगे बढ़ने की कोशिश की थी। भारतीय सैनिकों ने क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों और खेतों का प्रभावी इस्तेमाल करते हुए पाकिस्तानी टैंकों की बढ़त को रोक दिया।

असल उत्तर की लड़ाई को बाद में ‘पैटन टैंकों का कब्रिस्तान’ के नाम से भी जाना गया।

अब्दुल हमीद की वीरता को किया याद

फेस्टिवल में कंपनी क्वार्टरमास्टर हवलदार अब्दुल हमीद की बहादुरी को भी याद किया गया। अब्दुल हमीद 4 ग्रेनेडियर्स में तैनात थे और असल उत्तर की लड़ाई में उन्होंने पाकिस्तानी पैटन टैंकों के खिलाफ अदम्य साहस का प्रदर्शन किया था।

उनके अदम्य साहस और बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी वीरता आज भी भारतीय सैन्य इतिहास में विशेष स्थान रखती है।

पाकिस्तान की रणनीति पर भी हुई चर्चा

सैन्य विशेषज्ञों ने बताया कि पाकिस्तान की रणनीति खेमकरण सेक्टर से आगे बढ़कर ब्यास और हरिके की दिशा में महत्वपूर्ण मार्गों पर कब्जा करने की थी। इसका उद्देश्य अमृतसर की ओर जाने वाले महत्वपूर्ण रास्तों और संचार व्यवस्था को प्रभावित करना था।

हालांकि, भारतीय सेना ने क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों का इस्तेमाल करते हुए पाकिस्तानी सेना की बख्तरबंद ताकत को रोक दिया। असल उत्तर में अपनाई गई रक्षात्मक रणनीति को 1965 के युद्ध की महत्वपूर्ण सैन्य उपलब्धियों में गिना जाता है।

पंजाब की जनता के साहस को भी किया सलाम

लेफ्टिनेंट जनरल जेएस चीमा ने कहा कि 1965 का युद्ध केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं है, बल्कि यह पंजाब की धरती, यहां के लोगों की बहादुरी और भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस से जुड़ी जीवंत कहानी है।

उन्होंने अमृतसर और सीमावर्ती क्षेत्रों के संदर्भ में स्थानीय समुदायों की मजबूती और सेना के साथ उनके सहयोग को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का सहयोग राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण रहा है।

विद्यार्थियों के लिए हथियारों और सैन्य उपकरणों की प्रदर्शनी

मिलिट्री लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान सैन्य उपकरणों की प्रदर्शनी भी लगाई गई। इस प्रदर्शनी में युवाओं को सैन्य हथियारों और उपकरणों को नजदीक से देखने का अवसर मिला।

कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने सैन्य अधिकारियों और पूर्व सैनिकों से बातचीत की। इससे उन्हें भारतीय सेना के इतिहास, युद्ध अभियानों और सैनिकों के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने का मौका मिला।

सैन्य इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश

मिलिट्री लिटरेचर फेस्टिवल का उद्देश्य केवल युद्धों की घटनाओं को याद करना नहीं था, बल्कि सैन्य इतिहास और सैनिकों के अनुभवों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी था।

पूर्व सैनिकों ने विद्यार्थियों के साथ अपने अनुभव साझा किए और बताया कि युद्ध के दौरान केवल सैन्य रणनीति ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों का सहयोग, भौगोलिक परिस्थितियों की समझ और सैनिकों का मनोबल भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इस तरह के आयोजनों से युवाओं को देश के सैन्य इतिहास और सुरक्षा से जुड़े विषयों को करीब से समझने का अवसर मिलता है।

निष्कर्ष

अमृतसर के खालसा कॉलेज में आयोजित दो दिवसीय मिलिट्री लिटरेचर फेस्टिवल का समापन 1965 के भारत-पाक युद्ध और पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों की भूमिका पर चर्चा के साथ हुआ। पूर्व सैनिकों और सैन्य विशेषज्ञों ने खेमकरण और असल उत्तर की लड़ाइयों, हवलदार अब्दुल हमीद की वीरता और पंजाब के किसानों व ग्रामीणों के योगदान को याद किया। कार्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थियों को भारतीय सैन्य इतिहास, युद्ध रणनीति और सैनिकों के साहस को समझने का अवसर मिला।

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