15 अप्रैल 2026 : दिल्ली की चर्चित आबकारी नीति विवाद में एक नया मोड़ सामने आया है, जहां अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक नई हलफनामा (affidavit) दाखिल कर जज के मामले से अलग होने (recusal) की मांग की है।
इस ताजा हलफनामे में केजरीवाल ने दावा किया है कि संबंधित जज के बेटे को कुछ मामलों का आवंटन (case allotment) हुआ है, जिससे निष्पक्षता को लेकर ‘धारणा’ (perception) पर सवाल उठ सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा वास्तविक पक्षपात से ज्यादा न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वास से जुड़ा हुआ है।
केजरीवाल ने अपने पक्ष में यह तर्क दिया कि न्याय केवल निष्पक्ष होना ही नहीं चाहिए, बल्कि ऐसा दिखना भी जरूरी है। यदि किसी भी तरह की आशंका उत्पन्न होती है, तो न्यायपालिका की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
यह मामला पहले से ही राजनीतिक और कानूनी दृष्टि से काफी संवेदनशील रहा है। आबकारी नीति को लेकर कई आरोप-प्रत्यारोप लगे हैं और इस पर विभिन्न जांच एजेंसियों द्वारा भी कार्रवाई की जा चुकी है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जज के recusal की मांग एक गंभीर मुद्दा होता है, क्योंकि इससे न्यायिक प्रक्रिया पर सीधा असर पड़ता है। यदि अदालत को लगता है कि किसी भी प्रकार का हितों का टकराव (conflict of interest) या उसकी धारणा मौजूद है, तो जज खुद को मामले से अलग कर सकते हैं।
हालांकि, इस तरह की मांगों को अदालत बहुत सावधानी से देखती है, ताकि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग न हो।
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर न्यायपालिका में ‘पक्षपात बनाम धारणा’ की बहस को तेज कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी होता है, ताकि न्यायिक स्वतंत्रता और पारदर्शिता दोनों कायम रहें।
फिलहाल इस मामले में आगे की सुनवाई का इंतजार किया जा रहा है, जहां अदालत यह तय करेगी कि जज का recusal आवश्यक है या नहीं।
कुल मिलाकर आबकारी नीति विवाद में यह नया घटनाक्रम न केवल कानूनी बल्कि राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसका असर आगे की कार्यवाही पर पड़ सकता है।
