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पटियाला के 22 किसानों को पराली न जलाने पर मिला सम्मान

15 अक्तूबर 2026: पंजाब के पटियाला जिले में पराली जलाने से बचने और फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन करने वाले 22 किसानों को सम्मानित किया गया। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग की ओर से इन किसानों को ‘गार्डियंस ऑफ द एनवायरनमेंट’ यानी ‘पर्यावरण के रक्षक’ प्रशंसा प्रमाणपत्र प्रदान किए गए। इस पहल का उद्देश्य उन किसानों को प्रोत्साहित करना है, जो धान की कटाई के बाद पराली जलाने के बजाय पर्यावरण के अनुकूल तरीकों को अपना रहे हैं।

यह सम्मान समारोह पटियाला में आयोजित किया गया। उपायुक्त डॉ. हिमांशु अग्रवाल की ओर से अतिरिक्त उपायुक्त (सामान्य) अनृप्रीता जोहल ने किसानों को प्रमाणपत्र प्रदान किए। इस अवसर पर कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के अधिकारी रविंदरपाल सिंह छठा और प्रभदीप सिंह भी मौजूद रहे। अधिकारियों ने किसानों के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि पराली प्रबंधन के बेहतर तरीके अपनाने से वायु प्रदूषण को कम करने और मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बनाए रखने में मदद मिलती है।

सम्मानित किसानों में सुल्तानपुर के अमनदीप सिंह, गज्जूमाजरा के नछत्तर सिंह, ककराला के अमरीक सिंह, शेखूपुर के परगट सिंह, चलैला के गुरबचन सिंह और बिक्कर सिंह शामिल हैं। इसके अलावा रेतगढ़ के अरशदीप सिंह और सुखविंदर सिंह, कौली के बख्शीश सिंह, मोहब्बतपुर के सरबजीत सिंह, रामगढ़ के हरिंदर सिंह, दियागढ़ के बुध सिंह और अलौरां के हरदीप सिंह को भी सम्मानित किया गया।

अन्य सम्मानित किसानों में बीड़रवाल के अच्छर सिंह, मल्लेवाल के जसविंदर सिंह, तोदरवाल के जगजीत सिंह, गलवट्टी के बलविंदर सिंह, ढींगी के कीमत सिंह, कमेली के नवजोत सिंह, खोक के मनजीत सिंह, बनेरा खुर्द के हरदेव सिंह और अलोवाल के धर्मजीत सिंह शामिल हैं। इन किसानों ने पराली प्रबंधन के तरीकों को अपनाकर दूसरे किसानों के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है।

अतिरिक्त उपायुक्त अनृप्रीता जोहल ने कहा कि पंजाब सरकार किसानों को धान की पराली के उचित प्रबंधन के लिए आवश्यक मशीनरी उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे फसल अवशेषों को जलाने के बजाय वैज्ञानिक तरीकों से उनका प्रबंधन करें। उन्होंने यह भी कहा कि पराली न जलाने वाले किसानों की पहल दूसरे किसानों को प्रेरित कर सकती है और इससे स्वच्छ पर्यावरण बनाने के सामूहिक प्रयासों को मजबूती मिलेगी।

पराली प्रबंधन के लिए मुख्य रूप से दो तरीके अपनाए जा सकते हैं। पहले तरीके को इन-सीटू प्रबंधन कहा जाता है, जिसमें पराली को खेत में ही मशीनों की मदद से मिट्टी में मिलाया जाता है। इससे फसल अवशेषों का उपयोग मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। दूसरा तरीका एक्स-सीटू प्रबंधन है, जिसमें बेलर जैसी मशीनों की सहायता से पराली को खेत से बाहर निकाला जाता है। इसके बाद उसका उपयोग विभिन्न आवश्यकताओं के अनुसार किया जा सकता है।

धान की कटाई के बाद पराली जलाने से उठने वाला धुआं वायु प्रदूषण बढ़ा सकता है। इसके अलावा आग से मिट्टी में मौजूद उपयोगी सूक्ष्मजीव प्रभावित हो सकते हैं और मिट्टी के पोषक तत्वों को भी नुकसान पहुंच सकता है। पराली को उचित तरीके से संभालने से इन समस्याओं को कम करने और कृषि संसाधनों का बेहतर उपयोग करने में मदद मिलती है।

कृषि विभाग ने सम्मानित किसानों से अपने-अपने गांवों और आसपास के क्षेत्रों में दूसरे किसानों को भी जागरूक करने की अपील की। अधिकारियों का मानना है कि केवल सरकारी प्रयासों से पराली जलाने की समस्या का समाधान संभव नहीं है। इसके लिए किसानों की भागीदारी, उचित मशीनरी की उपलब्धता और फसल अवशेषों के उपयोग के व्यावहारिक विकल्पों का विस्तार जरूरी है।

पटियाला के 22 किसानों को दिया गया यह सम्मान पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ खेती के महत्व को सामने लाता है। यदि अधिक किसान पराली प्रबंधन के वैकल्पिक तरीकों को अपनाते हैं, तो इससे प्रदूषण कम करने, मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने और कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने में योगदान मिल सकता है।

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