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राज ठाकरे ने एक कदम पीछे खींचा, बीजेपी के खिलाफ ठाकरे बंधुओं की रणनीति पर सस्पेंस

मुंबई 24 दिसंबर 2025 : पिछले कई दशकों से महाराष्ट्र की सामाजिक और राजनीतिक दिशा तय करने वाला ठाकरे नाम एक प्रभावशाली ब्रांड रहा है। पहले प्रबोधनकार ठाकरे ने सामाजिक आंदोलनों के जरिए और फिर बालासाहेब ठाकरे ने “भूमिपुत्रों के अधिकार” और आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति के माध्यम से महाराष्ट्र में ठाकरे ब्रांड को स्थापित किया। लेकिन बीते कुछ वर्षों में इस ब्रांड की चमक फीकी पड़ी है। पार्टी टूटने के बाद उद्धव ठाकरे की राजनीतिक ताकत कमजोर हुई, वहीं लगातार चुनावी हार के चलते राज ठाकरे और उनकी मनसे की स्थिति भी मजबूत नहीं रही।

इसी पृष्ठभूमि में झटके झेल रहे ठाकरे ब्रांड को फिर से खड़ा करने के लिए राज और उद्धव ठाकरे ने कमर कस ली है। आने वाले महानगरपालिका चुनावों के जरिए अपने-अपने दलों में नई जान फूंकने के लिए दोनों भाई क्या रणनीति बना रहे हैं और इस मेल-मिलाप के लिए राज ठाकरे ने एक कदम पीछे कैसे खींचा—यही इस पूरे घटनाक्रम का केंद्र है।

17 नवंबर 2012 को शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे का निधन हुआ। इसके बाद शिवसेना की पूरी जिम्मेदारी उद्धव ठाकरे पर आ गई। उन्होंने पार्टी का नेतृत्व करते हुए 2019 में मुख्यमंत्री पद भी संभाला। मगर 2021 में शिवसेना में बड़ा राजनीतिक भूचाल आया। एकनाथ शिंदे अपने समर्थक विधायकों के साथ पहले सूरत और फिर गुवाहाटी पहुंचे। इसके बाद बड़ी संख्या में विधायक उद्धव का साथ छोड़कर शिंदे गुट में चले गए। देखते ही देखते शिवसेना का नाम और ‘धनुष-बाण’ चिन्ह उद्धव ठाकरे के हाथ से निकल गया।

लोकसभा चुनाव में कुछ हद तक संतोषजनक प्रदर्शन के बावजूद विधानसभा चुनाव में उद्धव ठाकरे को प्रतीक की कमी खली और उनकी पार्टी को सीमित सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। इसके बाद पार्टी में टूट-फूट और तेज हुई; कई पूर्व विधायक और स्थानीय नेता सत्ताधारी महायुति में शामिल हो गए।

दूसरी ओर, मनसे प्रमुख राज ठाकरे के खेमे में भी उत्साह कम है। 2009 के पहले विधानसभा चुनाव और 2012 के मनपा चुनावों में अच्छी सफलता के बाद मनसे का ग्राफ लगातार नीचे गया। हालिया विधानसभा चुनाव में मनसे का एक भी उम्मीदवार नहीं जीता; यहां तक कि राज ठाकरे के पुत्र अमित ठाकरे भी दादर से हार गए।

ऐसी स्थिति में ठाकरे ब्रांड को जीवित रखने के लिए एकजुटता जरूरी समझते हुए राज और उद्धव ठाकरे ने साथ आने का फैसला किया। वरली में हुए कार्यक्रम से इस मेल का पहला संकेत मिला। इसके बाद मुलाकातों का सिलसिला बढ़ा—27 जुलाई को उद्धव के जन्मदिन पर राज ठाकरे मातोश्री पहुंचे, 27 अगस्त को गणेश दर्शन के बहाने उद्धव, राज के निवास शिवतीर्थ गए, और 10 सितंबर को उद्धव अपने सहयोगियों के साथ फिर शिवतीर्थ पहुंचे। इसी बैठक में मुंबई समेत अन्य महानगरपालिकाओं को लेकर विस्तृत चर्चा हुई और राजनीतिक गठबंधन की संभावना पर मुहर लग गई।

हालांकि, शिवसेना और मनसे के बीच गठबंधन का रास्ता आसान नहीं है। पिछले दो दशकों में दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच तीखे टकराव हुए हैं। राज ठाकरे के शिवसेना से अलग होने के बाद कई बार मनसैनिकों और शिवसैनिकों में संघर्ष भी देखने को मिला है। बावजूद इसके, बदलते राजनीतिक हालात में ठाकरे बंधुओं की यह नजदीकी महाराष्ट्र की राजनीति में एक नए अध्याय की ओर इशारा कर रही है।

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