नई दिल्ली 25 मार्च 2026 : विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के आधार पर एक छात्रा के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को रद करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर हमला करने वाले शैक्षिक संस्थानों के प्रबंधन पर तल्ख टिप्पणी की है।
अदालत ने कहा कि कोई भी विश्वविद्यालय शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों या विचारों की अभिव्यक्ति पर सिर्फ इसलिए रोक नहीं लगा सकता, क्योंकि छात्रों की ओर से व्यक्त किए गए विचार प्रबंधन की विचारधारा से मेल नहीं खाते हैं।
विश्वविद्यालय ने एक छात्रा पर की थी अनुशासनात्मक कार्रवाई
अदालत ने यह टिप्पणी कैंपस में हुए एक विरोध प्रदर्शन में शामिल होने पर एक छात्रा के खिलाफ डाॅ. बी.आर. अंबेडकर विश्वविद्यालय द्वारा की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई पर की।
प्रबंधन की कार्रवाई के खिलाफ छात्रा की याचिका को स्वीकार करते हुए अदालत ने माना कि विश्वविद्यालय द्वारा दी गई सजा को कानून की नजर में सही नहीं ठहराया जा सकता।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि शांतिपूर्ण असहमति और चर्चा शैक्षणिक माहौल का एक अभिन्न अंग हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय की भूमिका असहमति के हर रूप को दबाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि ऐसी अभिव्यक्तियों का जवाब दिया जाए और उन पर ध्यान दिया जाए। यह पूरा मामला रैगिंग के आरोपों से उपजे एक विवाद से जुड़ा है।
रैगिंग, बुलीइंग का सामना करना पड़ा
‘ग्लोबल स्टडीज’ प्रोग्राम की छात्रा ने आरोप लगाया कि उसे गंभीर रैगिंग, बुलीइंग और लिंग आधारित टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। इस संबंध में की गई शिकायतों और विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के लिए उसे निलंबित कर दिया गया। छात्रा ने जून और अगस्त 2025 में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा जारी किए गए दो आदेशों को चुनौती दी थी।
निलंबन के खिलाफ पूर्व में दायर एक याचिका पर अदालत ने अप्रैल 2025 में छात्रा को कक्षाओं में शामिल होने की अनुमति तो दे दी, लेकिन साथ ही यह निर्देश भी दिया कि जांच चलने तक वह इस घटना से जुड़े किसी भी विरोध प्रदर्शन या प्रदर्शन में हिस्सा न ले।
… सजा देने का अधिकार सिर्फ कोर्ट के पास
वहीं, विश्वविद्यालय ने आरोप लगाया कि छात्रा ने कोर्ट के निर्देशों के साथ-साथ विश्वविद्यालय की ‘छात्र अनुशासन संहिता’ का उल्लंघन किया। अदालत के आदेश का उल्लंघन करने के विश्वविद्यालय के तर्क को ठुकराते हुए पीठ ने कहा कि अगर कोई कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करता है, तो उसे सजा देने का अधिकार सिर्फ कोर्ट के पास ही होता है।
अनुशासनात्मक कार्रवाई की वजह से छात्रा का एक अकादमिक साल बर्बाद होने के तथ्य को देखते हुए अदालत छात्रा को जुलाई 2026 से शुरू होने वाले तीसरे सेमेस्टर से अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करने की इजाजत देने का निर्देश दिया।
