5 नवंबर 2026 : सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दे पर स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की समयसीमा उसकी वास्तविक हिरासत शुरू होने के समय से गिनी जाएगी, न कि केवल औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज किए जाने के समय से। अदालत के इस स्पष्टीकरण का संबंध संविधान के अनुच्छेद 22(2) में दिए गए उस अधिकार से है, जिसके तहत गिरफ्तार व्यक्ति को यात्रा में लगने वाले आवश्यक समय को छोड़कर 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, किसी व्यक्ति को पहले से हिरासत में रखकर बाद में उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दिखाने से संवैधानिक सुरक्षा के उद्देश्य को प्रभावित नहीं किया जा सकता। गिरफ्तारी की प्रक्रिया में वास्तविक स्थिति और व्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगे प्रतिबंध को ध्यान में रखना जरूरी है।
इस कानूनी व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी व्यक्ति को पुलिस या जांच एजेंसी अपनी मर्जी से लंबे समय तक हिरासत में न रख सके। मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने से हिरासत की न्यायिक जांच संभव होती है और व्यक्ति को कानून के तहत उपलब्ध अधिकारों का संरक्षण मिलता है।
इस फैसले को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने साफ किया कि जांच एजेंसियां किसी व्यक्ति को हिरासत में रखने के बाद गिरफ्तारी की औपचारिक कार्रवाई में देरी करके 24 घंटे की संवैधानिक समयसीमा को आगे नहीं बढ़ा सकतीं।
चार आरोपियों की याचिका पर आया फैसला
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला त्रिपुरा हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर अपीलों पर आया, जिसमें एनडीपीएस (NDPS) अधिनियम के तहत दर्ज मामले में चार आरोपियों को जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। इन चारों व्यक्तियों ने अपनी हिरासत और गिरफ्तारी की प्रक्रिया को चुनौती दी थी।
मामले के अनुसार, चारों आरोपियों को 29 सितंबर 2025 को दोपहर करीब 2 बजे तलाशी और जब्ती की कार्रवाई के दौरान हिरासत में लिया गया था। हालांकि, पुलिस और जांच एजेंसी के रिकॉर्ड में उनकी औपचारिक गिरफ्तारी 30 सितंबर को सुबह 11 बजे दिखाई गई। इस तरह वास्तविक हिरासत शुरू होने और औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने के बीच लगभग 21 घंटे का अंतर था।
आरोपियों की ओर से दलील दी गई कि उन्हें वास्तविक हिरासत में लिए जाने के समय से 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया। इसलिए उनकी हिरासत संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है।
जस्टिस उज्जल भुइयां और अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने सुनाया फैसला
इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने की, जिसमें न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर शामिल थे। पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत गिरफ्तारी और हिरासत को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर वास्तविक रूप से प्रतिबंध लगा दिया गया है, तो उसी समय से 24 घंटे की अवधि की गणना शुरू होगी। जांच एजेंसी बाद में गिरफ्तारी का आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार करके पहले से बीते समय को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
पीठ ने यह भी कहा कि तलाशी, जब्ती, पूछताछ या जांच के नाम पर औपचारिक गिरफ्तारी से पहले हिरासत में बिताए गए समय को 24 घंटे की गणना से बाहर नहीं रखा जा सकता।
केवल यात्रा के समय को मिलेगी छूट
सुप्रीम कोर्ट ने 24 घंटे की समयसीमा की गणना को लेकर एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया। अदालत के अनुसार, इस अवधि में केवल वह उचित समय शामिल नहीं किया जाएगा, जो व्यक्ति को गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचाने में लगता है।
इसके अलावा जांच, पूछताछ, तलाशी और जब्ती की कार्रवाई में लगा समय भी 24 घंटे की कुल अवधि में गिना जाएगा। जांच एजेंसियों को इस समयसीमा का पालन करना होगा और किसी व्यक्ति को बिना न्यायिक निगरानी के निर्धारित अवधि से अधिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
अदालत ने कहा कि संविधान की ओर से दी गई सुरक्षा को किसी कानूनी प्रक्रिया या प्रशासनिक तरीके से कमजोर नहीं किया जा सकता।
24 घंटे से अधिक अवैध हिरासत पर तत्काल रिहाई
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को निर्धारित 24 घंटे की अवधि से अधिक समय तक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए बिना हिरासत में रखा जाता है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाना चाहिए।
पीठ ने इस मामले में पाया कि चारों आरोपियों को वास्तविक हिरासत में लिए जाने के बाद लगभग 18 घंटे तक न्यायिक निगरानी उपलब्ध नहीं थी। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत दिए गए अधिकारों का उल्लंघन माना और उनकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया।
यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने वाली कार्रवाई की न्यायिक निगरानी समय पर होना जरूरी है। केवल गिरफ्तारी का दस्तावेज तैयार कर देना संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
मजिस्ट्रेट की भी होगी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक मजिस्ट्रेटों की भूमिका को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट को आरोपी को पेश किए जाने पर वास्तविक हिरासत की तारीख और समय का रिकॉर्ड दर्ज करना चाहिए।
मजिस्ट्रेट को स्वतंत्र रूप से यह जांचना होगा कि संबंधित व्यक्ति को हिरासत में कब लिया गया था और क्या उसे संवैधानिक समयसीमा के भीतर अदालत में पेश किया गया है।
इसके अलावा मजिस्ट्रेट को हिरासत की अवधि की उचितता पर भी विचार करना होगा। यदि परिस्थितियों के अनुसार हिरासत की अवधि अनुचित या जरूरत से ज्यादा पाई जाती है, तो मजिस्ट्रेट रिमांड देने से इनकार कर सकता है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हिरासत की अवधि 24 घंटे से कम होने का मतलब यह नहीं है कि जांच एजेंसी व्यक्ति को बिना उचित कारण उस पूरी अवधि तक हिरासत में रख सकती है। हिरासत की अवधि परिस्थितियों के अनुसार उचित होनी चाहिए।
पहले के हाईकोर्ट फैसलों पर भी जताई असहमति
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में ओडिशा हाईकोर्ट के आर्यमन पटनायक मामले, मद्रास हाईकोर्ट के कन्नन मामले और केरल हाईकोर्ट के अरुण के. थॉमस मामले में दिए गए उन विचारों को सही कानून नहीं माना, जिनमें औपचारिक गिरफ्तारी से पहले की हिरासत की अवधि को 24 घंटे की गणना से बाहर रखने की अनुमति दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि हिरासत और गिरफ्तारी के बीच कृत्रिम अंतर करके किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता।
