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दिल्ली में बारिश से मिली साफ हवा की राहत खत्म होने लगी, एक दिन में वायु गुणवत्ता सूचकांक 65 से बढ़कर 216 पहुंचा

17 अक्तूबर 2026: राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण एक बार फिर चिंता का विषय बन गया है। बारिश और तेज हवाओं के कारण हवा की गुणवत्ता में सुधार के बाद प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ा है। हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 65 से बढ़कर 216 तक पहुंच गया। AQI में यह उछाल संकेत देता है कि बारिश से मिली राहत अस्थायी थी और मौसम में बदलाव के साथ प्रदूषक दोबारा हवा में जमा होने लगे हैं। सर्दियों की शुरुआत, कम हवा की गति और उत्तर भारत में पराली जलाने की घटनाएं आने वाले दिनों में स्थिति को और खराब कर सकती हैं।

बारिश से सुधरी हवा, लेकिन राहत ज्यादा देर नहीं टिकी

दिल्ली में सितंबर के आखिरी दिनों में हुई बारिश और तेज हवाओं ने वातावरण में मौजूद प्रदूषक कणों को कम करने में मदद की थी। इसके कारण वायु गुणवत्ता में सुधार हुआ और AQI संतोषजनक स्तर तक पहुंच गया। हालांकि, बारिश बंद होने और हवा की गति कम होने के बाद प्रदूषण के कण दोबारा वातावरण में जमा होने लगे।

विशेषज्ञों के अनुसार, बारिश हवा में मौजूद धूल और प्रदूषक कणों को नीचे लाने में मदद करती है। लेकिन इससे वाहनों, उद्योगों, निर्माण गतिविधियों और अन्य स्रोतों से लगातार निकलने वाला प्रदूषण खत्म नहीं होता। जैसे ही मौसम शुष्क होता है, हवा में प्रदूषण का स्तर फिर बढ़ने लगता है।

कमजोर हवाएं बढ़ा सकती हैं परेशानी

दिल्ली में प्रदूषण बढ़ने का एक प्रमुख कारण मौसम में बदलाव है। मानसून की वापसी के बाद हवा की गति और दिशा में परिवर्तन होता है। जब हवाएं धीमी पड़ जाती हैं, तो प्रदूषकों को वातावरण में फैलने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता। इसके कारण धूल और अन्य हानिकारक कण जमीन के नजदीक जमा होने लगते हैं।

सर्दियों के दौरान तापमान में गिरावट और तापमान प्रतिलोमन जैसी परिस्थितियां भी प्रदूषण को बढ़ा सकती हैं। तापमान प्रतिलोमन में जमीन के पास ठंडी हवा के ऊपर अपेक्षाकृत गर्म हवा की परत बन जाती है। इससे हवा का सामान्य ऊर्ध्वाधर मिश्रण सीमित हो सकता है और प्रदूषक सतह के करीब फंसे रह सकते हैं।

पराली जलाने की घटनाओं से बढ़ी चिंता

दिल्ली की हवा को प्रभावित करने वाला एक अन्य महत्वपूर्ण कारक पंजाब और हरियाणा जैसे पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने की घटनाएं हैं। धान की कटाई के बाद किसान अगली फसल की तैयारी के लिए खेतों में बचे अवशेषों को जलाते हैं। इससे निकलने वाला धुआं मौसम और हवा की दिशा के अनुसार आसपास के क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।

हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब में 15 सितंबर से 13 अक्टूबर 2026 के बीच पराली जलाने की 174 घटनाएं दर्ज की गईं, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में 134 घटनाएं सामने आई थीं। यानी घटनाओं में करीब 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई। हालांकि, दिल्ली के AQI में हालिया उछाल का पूरा कारण केवल पराली जलाने को नहीं माना जा सकता। स्थानीय प्रदूषण और मौसम की परिस्थितियां भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

वाहनों और निर्माण कार्यों का भी असर

दिल्ली में वायु प्रदूषण केवल पड़ोसी राज्यों से आने वाले धुएं की वजह से नहीं बढ़ता। वाहनों से निकलने वाला धुआं, सड़कों की धूल, निर्माण कार्य, औद्योगिक गतिविधियां और कचरा जलाना भी प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं।

सड़कों पर वाहनों की बड़ी संख्या और निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल हवा में कणों की मात्रा बढ़ा सकती है। यदि हवा की गति कम हो, तो ये कण लंबे समय तक वातावरण में बने रहते हैं। इसलिए प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए स्थानीय स्रोतों से होने वाले उत्सर्जन को कम करना भी जरूरी है।

AQI 216 का क्या मतलब है?

भारत में वायु गुणवत्ता सूचकांक को छह श्रेणियों में बांटा गया है। AQI 0 से 50 तक अच्छा, 51 से 100 संतोषजनक, 101 से 200 मध्यम, 201 से 300 खराब, 301 से 400 बहुत खराब और 401 से 500 गंभीर श्रेणी में आता है।

इस आधार पर AQI 216 का मतलब है कि दिल्ली की हवा खराब श्रेणी में पहुंच गई है। ऐसे स्तर पर संवेदनशील लोगों, विशेष रूप से सांस और हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों, बच्चों और बुजुर्गों को परेशानी हो सकती है।

प्रदूषण बढ़ने के दौरान लोगों को स्थानीय AQI की जानकारी लेते रहना चाहिए। बाहर व्यायाम करने से बचना, प्रदूषण अधिक होने पर बाहरी गतिविधियां सीमित करना और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।

आने वाले दिनों में क्यों बिगड़ सकती है स्थिति?

अक्टूबर के दूसरे हिस्से में दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण बढ़ने की आशंका इसलिए बनी हुई है क्योंकि मानसून की बारिश कम हो जाती है और सर्दियों की परिस्थितियां धीरे-धीरे विकसित होने लगती हैं। यदि हवा की गति कमजोर रहती है और बारिश नहीं होती, तो वाहनों, उद्योगों, धूल और अन्य स्रोतों से निकलने वाले प्रदूषक तेजी से जमा हो सकते हैं।

इसके साथ ही पराली जलाने की घटनाएं और त्योहारों के दौरान पटाखों से होने वाला उत्सर्जन भी हवा की गुणवत्ता पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। हालांकि, प्रदूषण का वास्तविक स्तर आने वाले दिनों के मौसम, हवा की दिशा और विभिन्न स्रोतों से निकलने वाले उत्सर्जन पर निर्भर करेगा।

दिल्ली में AQI का 65 से 216 तक पहुंचना दिखाता है कि साफ हवा की अस्थायी राहत के बाद प्रदूषण कितनी तेजी से लौट सकता है। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए केवल बारिश या मौसम में बदलाव पर निर्भर रहने के बजाय वाहनों, निर्माण कार्यों, उद्योगों, सड़क की धूल और पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण पर लगातार कार्रवाई करना जरूरी है।

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